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NEP 2020 और महाविद्यालय परिसर

१- असाइनमेंट जमा किए जा रहे । सब लाइन से आ रहे । कमरे के बाहर की पूछताछ कानों में पड़ रही है ।  क्या पूछा मैम ने ?  एक छात्र अंदर दाखिल हुआ ।  हमने फाइल हाथ में लेते हुआ पूछा किस टॉपिक पर बनाया । छात्र कुछ कहता इससे पहले ही फाइल पर निगाह डाली और बोला अच्छा !! सत्तावनी क्रांति !!  अच्छा !क्रांति के कारण स्वरूप और परिणाम में से कुछ भी बता दो । छात्र सोचने लगता है (जरा कल्पना कीजिए कैसे सोच रहा होगा ) और हम लगभग आठ सौ छात्रों की अवार्ड लिस्ट में उसका नाम खोजते हैं । नाम मिल चुका है।  हम कुछ मगन मूड में हैं ।  हमने कहा अगर सोच चुके हो तो प्रश्न का उत्तर बता दो । छात्र ने  कहा नहीं मालूम ।  नहीं मालूम तो जाओ।  हमने कुछ अंक उछाल दिये उसके नाम के आगे ।  जरा सोचिए तो  पच्चीस में कितना  अंक ?? २-विभाग के बाहर खड़ी छात्रा दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए पूछती है- ‘मे आई कम इन मैम ‘  हम मगन मूड में हैं ।  मैंने कहा बताओ क्या है। छात्रा कहती  है- ह्वाट्सऐप ग्रुप में नाम ऐड करवाना है । हमने कहा ये काम स्टूडेंट करते हैं आप उनसे ही म...

Lakhimpur Student Union Election

  बात   तब   की   है   जब   यह   अजनबी   शहर   धीरे   धीरे   अपना   सा   हो   रहा   था   ।   धड़कनों    में   बसता   था  , वाई   डी   कालेज   और   राजगढ़   मुहल्ला   । डाक   से   भेजी   जाने   वाली   चिट्ठियों   में   जयदेवनगर   भी   दर्ज   होता   था   ।   यह   नाम    वाई   डी   कालेज   के   पहले   यशस्वी   प्रिन्सिपल   के   नाम   पर पड़ा   था    ।   हम   कालेज   गेट   से   बाहर   दूसरी   गली   में   तिवारी   जी   के   मकान   में   पहली   मंज़िल   पर   रहते   थे   ।   इन्हें   हम   बाबूजी   कहते   थे।   वाई   डी   कालेज   में   एक   कहावत   गहरे   से ...

कोरोना के दौर मे अल्बर्ट कामू के उपन्यास "दि प्लेग” की प्रासंगिकता

कोरोना महामारी के इस दौर में बीती शताब्दियों में आयी महामारियों एवं उनसे निपटने के तरीक़ों को जानने की तलब से जब हमने प्लेग पर लिखी “ प्लेग” नामक किताब जो ‘आलबर्ट कामू’ ने लिखा उसे पढ़ा (मूल रूप से La peste नाम से प्रकाशित) 25 August 1962 राजकमल प्रकाशन 7/-रुपए मूल्य हिंदी अनुवाद  शिवदान सिंह चौहान व विजय चौहान ने किया है । भारत के संदर्भ में प्राचीन काल में किसी महामारी  को प्लेग कहते थे। भारत में 1835 के आसपास प्लेग सबसे पहले गुजरात के कच्छ और काठियावाड़ बाद में हैदराबाद सिंध और अहमदाबाद में फैला और कुछ कुछ साल बाद प्लेग फैलता रहा । सैकड़ों लोगों की प्लेग से जान जाती रही। ब्रिटिश काल में सूरत में फैली प्लेग और उससे निबटने की तैयारियों के बीच प्रशासन के ग़लत रूख ने कई बार आंदोलनकारियों को उद्वेलित किया ।इसके लिए 1853में जाँच कमीशन की नियुक्ति हुई। प्लेग सबसे अधिक उस समय के मुंबई और बंगाल प्रांत में फैला। नई औषधियों के आने से पूर्व प्लेग का एक ही इलाज था चूहों का विनाश और दूसरा चूहे गिरने के स्थानों को छोड़ देना। इस महामारी में गाँव के गाँव वीरान हो जाते थे। बाद मे...