कोरोना के दौर मे अल्बर्ट कामू के उपन्यास "दि प्लेग” की प्रासंगिकता
कोरोना महामारी के इस दौर में बीती शताब्दियों में आयी महामारियों एवं उनसे निपटने के तरीक़ों को जानने की तलब से जब हमने प्लेग पर लिखी “ प्लेग” नामक किताब जो ‘आलबर्ट कामू’ ने लिखा उसे पढ़ा (मूल रूप से La peste नाम से प्रकाशित) 25 August 1962 राजकमल प्रकाशन 7/-रुपए मूल्य हिंदी अनुवाद शिवदान सिंह चौहान व विजय चौहान ने किया है । भारत के संदर्भ में प्राचीन काल में किसी महामारी को प्लेग कहते थे। भारत में 1835 के आसपास प्लेग सबसे पहले गुजरात के कच्छ और काठियावाड़ बाद में हैदराबाद सिंध और अहमदाबाद में फैला और कुछ कुछ साल बाद प्लेग फैलता रहा । सैकड़ों लोगों की प्लेग से जान जाती रही। ब्रिटिश काल में सूरत में फैली प्लेग और उससे निबटने की तैयारियों के बीच प्रशासन के ग़लत रूख ने कई बार आंदोलनकारियों को उद्वेलित किया ।इसके लिए 1853में जाँच कमीशन की नियुक्ति हुई। प्लेग सबसे अधिक उस समय के मुंबई और बंगाल प्रांत में फैला। नई औषधियों के आने से पूर्व प्लेग का एक ही इलाज था चूहों का विनाश और दूसरा चूहे गिरने के स्थानों को छोड़ देना। इस महामारी में गाँव के गाँव वीरान हो जाते थे। बाद मे...