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Showing posts from August, 2019

बिन पानी सब सून, घरथरी के बहाने, पर्यावरणीय चिंताएं

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  "घरथरी"  क्या यह शब्द कभी सुना है आपने ? जो लोग पहले के होंगें और गाँव के कच्चे घरों में रहे होंगे , वो शायद जानते हों।कहीं कहीं इसे ‘’ घिरौंची ’’ भी कहते   थे। पहले कुएं ही पानी के साधन थे , जिससे पानी काढ़कर घरों में ( कुंडा , ठील्ला और गगरी में ) भरा जाता था। किसी के यहां दो कुंडा , किसी के यहां एक कुंडा और एक ठिल्ला और किसी के यहां सिर्फ एक ही कुंडा।   ( परानी यानि प्राणी ) सदस्यों मतलब औरतों की संख्या के हिसाब से पानी भरा जाता था क्योंकि पुरुष तो बाहर ही नहाते थे।   पानी भरने का काम कहार करते थे और दोनों टाइम पानी भरते थे।कुएं भी दो प्रकार के होते थे , एक घिरनी वाले जिससे पानी खींचा जाता था और इसमें थोड़ी आसानी रहती थी लेकिन इस प्रकार के कुओं की संख्या कम थी ।ज्यादातर ( लिलारी ) मतलब सील , कुएं के एक किनारे लकड़ी का मोटा बीम रखा रहता कहीं - कहीं पत्थर का भी रहता था जिसके सहारे पानी काढ़ा जाता था। अ...

हमारा पहला सिनेमा

संस्मरण पहले सिर्फ़ बाइस्कोप देखा था और उसी को सिनेमा समझते थे। फ़िल्मी गीत गाने ज़रूर रेडियो पर सुन रखे थे। पहली बार   सिनेमाहाल में जाकर सन् 1972 -73 में पहला सिनेमा देखा ,उत्तरप्रदेश के शहर मिर्ज़ापुर में। उम्र रही होगी चार- पाँच साल। दिन था दीपावली का। उस समय नया नया सिनेमाहाल बना था। नाम था-'तुलसी चित्र मंदिर। घर से ज्यादा दूर नहीं था। पापा की हिदायत थी की बच्चे धार्मिक ही सिनेमा देखेंगे ।तब यातायात के इतने साधन थे नहीं। जाने के लिए हम सब तैयार। लेकिन कोई वाहन   मिल ही नहीं रहा था ,जिससे झटपट पहुँचा जा सके । सामने ही कुम्हारों का परिवार रहता था। दो भाई थे ।एक का नाम था सठल्लू, दूसरे का मठल्लू। वे दिया,कुल्हड़, मिट्टी के खिलौने , बर्तन इत्यादि बनाते थे। कभी कभी हम बच्चों की फ़रमाइश पर हमारी मनपसंद साइज़ की गुल्लक भी बना देते । उनकी घंटों घूमती चाक और उस पर बनते मिट्टी के बर्तन हम देखते रहते। उनके पास एक ठेला गाड़ी थी। जिस पर लाद कर वे अपने बर्तन बेचने जाते थे ।हम लोगों की परेशानी देख वे झटपट अपना ठेला ले आए । बस क्या था -छोटे बच्चे ठेले पर और बड़े लोग साथ में पै...

अथ श्री ए॰टी॰एम॰ कथा

अपनी डिक्शनरी में बहुत बाद में एटीएम शब्द आया। हालाँकि इससे परिचय होने के पहले हमने अपनी एक दोस्त से बातों ही बातों में सुन रखा था कि ए॰टी॰एम॰ से जब चाहो अपना पैसा निकाल सकते हो। हम नया नाम और काम सुन अचकचाए कि ये क्या होता है। आँखों और मुँह को गोल घुमाने के बाद दोस्त ने बताया -‘ ऑल टाइम मनी ’ और हमने भी   सही मान लिया। कुछ महीने के अंतराल पर कालेज में ख़बर आयी कि हमारे शहर में भी ए॰टी॰एम॰ खुलने जा रहा है। सभी शिक्षकों में चर्चा कि एटीएम से जब चाहो पैसा निकाल लो।   तरह तरह की चर्चा।   कोई पूछे कैसे निकलेगा रुपया। तो दूसरा बताए - एक कार्ड लगाना होगा फिर   चार अंकों का पिनकोड डालना होगा । खुल जा    सिमसिम की तरह और खटखटखटखट मशीन से पैसा बाहर।एकदम कड़क नोट।   मतलब सुबह दोपहर शाम रात जब पैसा चाहिए मिल जाएगा!  जब   चाहो तब ???!!! हाँ भाई हाँ।जब चाहे तब। अब सबको जल्दी थी कि कार...

हँस्गुल्ले

१- बाऊजी की डिग्री सर्टिफ़िकेट ......... डिग्रियों को लेकर मची खींचा तानी में हमें इन्स्पेक्टर चाचा याद आते हैं।श्री लोकनाथसिंह। वो एल॰आई॰सी॰ में काम करते थे ।किस पद पर थे ये भी नहीं मालूम। लेकिन सब लोग उन्हें इंस्पेक्टर साहब ही कहते थे। 1978-79 में जब हम सातवीं जमात में पढ़ते थे। बहुत कम लोगों के पास बाइक होती थी,तब वे बुलेट से चलते थे । दग़दग़ दग़ दग़ करती बुलेट की आवाज़ और उस पर बैठे चाचा। दूर से ही हो जाती थी उनके आने की ख़बर। जब बुलेट पुरानी हो गई किसी ने कहा बेच क्यों नहीं देते। भोजपुरी कहावत में बोलते -“खुरपी के का बेचले का बंधक धइले” मतलब बेचने पर कितना मिलेगा ही जो बेच दें।पड़ी रहने देते हैं। वैसे उससे उनका लगाव गहरा रहा होगा। कहावत तो अपने मज़ाक़िया स्वभाव की वजह से कही होगी। चंदौली में हम लोग पापा के तबादले के बाद पहुँचे थे। पता चला वो गाँव के हमारे क़रीबी हैं, एक ही पूर्वज की संतान।हम लोगों की पारिवारिक नज़दीकी हो गई यहाँ।कई मज़ेदार बात बताते थे चाचा। उसी में से एक क़िस्सा डिग्रियों का है। हाँ तो डिग्री वाली बात यूँ है कि एक बार चाचा के घर में मेहमान आए थे। उनक...