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Showing posts from July, 2019

राजा साहब युवराजदत्त सिंह

हमारे युवराजदत्त महाविद्यालय के लिए आज का दिन बहुत ख़ास होता है। 31 जुलाई । महाविद्यालय के संस्थापक ,ओयल व कैमहरा स्टेट के राजा आदरणीय युवराजदत्त सिंह की जयंती आज ही है। आज़ादी के बाद 1949 ई० में उन्होंने इस क्षेत्र के लिए उच्च शिक्षा का सपना देखा। अब की बात और है किंतु 70 साल पहले जब ना तो इतने संसाधन थे ना ही विद्यालय और ना ही शिक्षा के प्रति जागरूकता , युवराज दत्त महाविद्यालय इस जनपद ही नहीं अपितु इस क्षेत्र के कई जिलों के लिए शिक्षा की रोशनी ले के आया। कहते हैं लखनऊ  और बरेली के बीच में खुला यह पहला उच्च शिक्षण संस्थान था। सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए ये महाविद्यालय अभी भी पहली पसंद है। उनके जन्मदिन पर लोग अपने अपने संस्मरण सुनाते हैं और राजा साहब के उदार व्यक्तित्व की चर्चा अवश्य करते हैं। ये बात दीगर है कि हमें उन्हें देखने का सौभाग्य नहीं मिला किंतु लोगों से सुने गए संस्मरण के बीच से जो तस्वीर ज़ेहन में उतरती है उससे सहज ही राजा साहब के प्रति सम्मान का भाव आ जाता है. एक दो सुने हुए संस्मरण आपके लिए- देश की आज़ादी के बाद महाविद्यालय नया नय...

बालगीत “गौरैया”

चिड़िया रानी आओ ना दाना पानी खाओ ना मिट्टी के एक बड़े कसोरे डाल के रखा ठंडा पानी साँवा कोंदों काकुन दाना खा के फिर उड़ जाओ ना चींचीं च्युँ च्युँ करती रहती फुदक फुदक कर दाना चुनती अपने गीत सुनाओ ना चिड़िया रानी आओ ना कोठा अँटारी खिड़की बंगला अलगनी झूला झूल रही तितली के संग आँख मिचौली तुम भी बरबस खेल रही आओ आओ आओ ना चिड़िया रानी आओ ना नूतन 20/03/2019

वो लड़की

वो डबडबायी आँखें । नक़ाब से लिपटा बदन और हिजाब से झाँकती सुंदर सलोनीसूरत। एक हाथ में बैग, दूसरे में काग़ज़ात के फ़ोल्डर। अचानक आ पहुँची अधिकारी के ऑफ़िस में।कुछ कहती उससे पहले ही आँखों में अटके आँसू झरने लगे। और फिर फूट के रोना। मन में ये तस्वीर उतर गई। और थोड़ी बेचैनी भी। आँसुओं की वजह कुछ कुछ ताड़ ही लिया । थोड़ी देर सुबकने के बाद अपने आँसुओं और दर्द को रोकते हुए उसके मिसरी से बोल फूटे- “आप तो प्रिन्सिपल हो ।मेरा ऐडमिशन कर सकते हैं” कलेजा चिर गया । काश क़लम में मेरे ताक़त होती! मैं कह देती जाओ हो जाएगा तुम्हारा। लेकिन ऐसा हो न सका। सुबकते हुए ही उसने बताया की अपने घर वालों से कितना लड़ झगड़ कर उन्हें इस बात के लिए तैयार किया था कि एम॰ए॰ का फ़ार्म हमें डालने दीजिए।और अब बताया जा रहा है कि तुम्हारा प्रवेश यहाँ नहीं हो सकता क्योंकि एक साल का गैप हो गया है। मैं चुपचाप सुनती रही उसे और देखती रही आँसुओं की झड़ी। सिर्फ़ दिलासा दे पायी- “ज़िंदगी ने शायद तुम्हें किसी और बड़े काम के लिए बचा रखा है,एक दरवाज़ा बंद हुआ है ,ग़ौर करो ,दूसरे रास्ते खुले होंगे तुम्हारे लिए।” धीमें क़दमों...

#लोककथाएँ

भोर में पाँच बजे की शान्ति को भंग करती, वो तेज़ आवाज़ में पियु पियू पियू पियू की रट लगाए थी। योग के लिए आयी सहेलियों ने एक लोककथा सुनायी। आप भी सुनिए। ........... बहुत पहले की बात है। एक औरत थी । उसका पति कमाने के लिए परदेस चला गया था। बेचारी औरत अपना और बच्चों का किसी तरह पालन पोषण करती रही। एक दिन उसका पति लौटा| बच्चे चिल्लाए - बप्पा आए बप्पा आए। ग़ुस्से में पत्नी ने अंदर से किवाड़ बंद कर लिया। उसे अपने कष्ट याद आ गए। सोचा कि उसका पति मनुहार करेगा, उसे मनाएगा । पर ऐसा हुआ  नहीं । उल्टे, पति अपनी खड़ाऊँ और डंडा बाहर रख कर वापस चला गया। थोड़ी देर बाद जब कोई आहट नहीं मिली तो पत्नी ने केवाड़ी खोली। पति को बाहर न पाकर वह पागल हो कर बोलने लगी -पियू कहाँ ,पियू कहाँ, पियू कहाँ ? फिर क्या हुआ कि बोलते-बोलते, बोलते-बोलते, बोलते -बोलते वह औरत चिड़िया बन गयी और आज भी वह पियू पियू की रट लगाए है।  इस प्रसंग से सम्बंधित चइता है। जिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा, कोयल तोरी बोलिया। सुतले बलम के जगावे हो रामा कोयल तोरी बोलिया।  1-रोज त बोलेलु कोइलर सझियां सबेरवां,-काहें आज बोल...

ऐतिहासिक किस्से

1- बहुत पहले की बात है। भारत देश में एक मुग़ल बादशाह था । उसका नाम था अकबर। अकबर बड़ा ही ज़हीन और बुद्धिवादी था। जब तक हर तरह से ठोंक बजा नहीं लेता किसी बात को मानता ही नहीं। वैसे एक बात बताऊँ ?वो ये कि अब तक ज्ञात स्रोतों के अनुसार उसे निरक्षर माना गया है। फिर ?? पढ़ना नहीं आता तो क्या हुआ, सुनकर भी तो सब जाना जा सकता है। ये वो बाख़ूबी जानता था।उसका दरबार नौरतनों से सज़ा रहता था। वह जानना चाहता था कि इस्लाम में क्या ख़ास है। दूसरे धर्मों में क्या ख़ास है। क्योंकि धर्म तो मानव निर्मित है। इसलिए उसने सभी धर्मों के रहस्य को जानने के लिए,धार्मिक चर्चा के लिए आगरे के समीप स्थित फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना का निर्माण करवाया।शुरू शुरू में कुछ धर्म के लोग ही इसमें प्रवेश पाते थे और धर्मों पर अपने अपने ज्ञान का आदान प्रदान करते थे। किंतु धीरे धीरे इबादतखाना में सभी धर्मों के विद्वानों को प्रवेश दिया जाने लगा। विद्वान तो विद्वान ठहरे । कोई किसी की सुनने या मानने को तैयार ही नहीं। “तेरा धर्म मेरे धर्म से अच्छा कैसे” इसी बात पर अक्सर गरमागरम बहसें होने लगतीं। ग़ुस्से में उनकी नसें तन ...

कैंसर: इलाज से बेहतर है बचाव

सबसे पहले मैं अपनी कहानी से शुरुआत करूँगी। बात लगभग दस साल पहले की है। होली के आसपास काम और परीक्षा ड्यूटी से थक कर बिस्तर पर हम लेटे थे । अचानक सीने के पास हाथ लगा , हम चौंक गए क्योंकि यहाँ सीने में दिल धड़कने के साथ साथ पत्थर खटक रहा था। वास्तव में सीने में कुछ कड़ा कड़ा सा महसूस हुआ। ऐसा लगा किसी ने ब्रेस्ट में पत्थर डाल दिया हो। मैं एकदम घबरा गई। उठ के बैठ गई।पति को बताया। सुनते ही उनका भी बुरा हाल।बस यही लगा कहीं कैंसर तो नहीं। भागे भागे एक गायनिक के पास गए। उन्होंने स्तन चेक करके बताया कि गाँठ है। आप अल्ट्रासाउंड करवाइए। हमने तुरंत अल्ट्रासाउंड करवाया तो उसमें गाँठ दिखायी पड़ी। दाहिने स्तन में 12 o’clock पोज़ीशन पर। हमने घर के बड़ों से बातचीत किया और उसे ऑपरेट करवाने का निर्णय लिया । डाक्टर ने समझाया कि ये फायब्राइड है, दूसरी बात ये गाँठ छूने पर इधर उधर फिसल रही है, कैंसरस गाँठें एक जगह (stegnent) जम जाती हैं,तीसरे आपको बुखार नहीं है मतलब कोई इंफ़ेक्शन नहीं है। इसलिए डरने की कोई बात नहीं। उन्होंने ये भी कहा कि आप चाहें तो एक दो साल दवा कर के देख सकती हैं शायद गाँठ गल जाय।लेकि...

बनारस देखिये आहिस्ते आहिस्ते

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बनारस की सुबह दशाश्वमेध सड़क पर ये दृश्य आम हैं।महिलायें गंडसा ले के छः इच तक के दतुअन काटती रहती हैं, बेचती रहती हैं,ढेरी लगाए रहती हैं कुछ दतुअन की साइज़ इतनी मोटी होती है की गलफड ही छील देते होंगे।पर सब बिकता है यहाँ। 31/05/2019 आजकल गरमियों में हाल-ए-सुबह बनारस। कभी होती रही होगी यहाँ की सुबह घड़ी घंटों घड़ियालों,शंख और मंत्रोच्चार की ध्वनियों से। धर्म और कर्मकांड की नगरी बनारस में आजकल अन्य पारम्परिक बातों के साथ घाटों के आसपास की सुबह कुछ अलग भी है। बच्चे अपने मम्मी पापा के साथ तैरने की कला सीख रहे होते हैं।इसमें पाँच साल से लेकर बड़े बच्चे सभी शामिल हैं, जिसको जब जुनून आ जाय। बच्चों के मातापिता घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सूर्योदय के पल पल बदलते दृश्यों को आँखों में या कैमरे में क़ैद करते ह ैं और बच्चे छपकछांय तैराकी की कला सीखने में लगे रहते हैं। धरम करम,पंडा पुजारी, चंदन टीका, फूलमाला दीया बाती ये सब अलग चलता है। विदेशी सयलानी यहाँ ख़ूब दिखते हैं। मल्लाह बोटिग कराने की मनुहार करते मिलेंगे। नीम की दातुअन बेचती महिलायें दिखेंगी। चायवाले फेरीलगाकर चाय बेचते और ऊँघते कुत...

#अपनी उड़ान, Driving skill

लोगों का क्या है उन्होंने कह दिया दोपहिया मोटर वह्किल चलाने में रखा क्या है। लेकिन उम्र की इस चढ़ाई पर कोई हमारे दिल से पूछे । पहली बार जूपिटर पर बैठ के कलेजा मुँह को आने लगता है। दिल ज़ोरों से धड़कने लगता है, हाथ पाँव एकदम ठंडे पड़ जाते हैं और यही लगता है कि एक्सिलेटर लिया नहीं कि ये गाड़ी हवा से बातें करने लगेगी और अगर कंट्रोल नहीं कर पाए तो कुछ भी हो सकता है। पिछले साल 12 साल पहले बने हमारे ड्राइविंग लाइसेंस को रिन्यू करवाने का समय हो गया था । मन में तरह तरह के भाव आते जा ते। -इतने सालों में बड़ी छोटी कोई गाड़ी तो चला न पाए फिर क्या ज़रूरत है इसको दोबारा बनवाने की। -आईडी प्रूफ़ के लिए भी कई चीज़ें हो गई हैं। फिर भी,आरटीओ आफिस चले गए। क़स्बों या छोटे शहरों में किसी पद पर रहने पर आसानी से बहुत से काम हो जाते है।कई परिचित मिल जाते हैं। बारह साल पुराना लाइसेंस नया होने में कोई दिक़्क़त नहीं थी। हम आरटीओ अधिकारी से मिले । औपचारिकता में उन्होंने चाय मगवायी थोड़ी बातचीत के बाद उन्होंने कहा बन जाएगा नया ड्राइविंग लाइसेंस और अपने मातहत कर्मचारियों को निर्देश देकर काग़ज़ी कार्यवाही ...

छोटे शहरों की बड़ी बातें

आपके शहर में साइकिल में हवा न हो तो आप क्या करते हैं? कल से साइकिल में हवा नहीं थी। चले तो चले कैसे|कल ईद थी तो हर तरफ़ बंदी । आज सुबह सुबह आसपास घूम आए कहीं कोई नहीं दिखा। थोड़ी देर में दिखा जाफ़र मियाँ हवा भरने का पम्प लिए चले आ रहे हैं। दरअसल उनको हमारे कालेज के एक कर्मचारी दुकान खोलने से पहले ही साथ लिवा लाए। जाफ़र की दुकान सड़क किनारे खुले में हैं, वहीं पर बैठ कर साइकिल बनाते हैं। उन्होंने सायकिल में हवा भरी मिठाई खायी और चल दिए अपनी दुकान खोलने। हमें आश्चर्य हुआ उन्होंने बोहनी के नाम पर भी कुछ नहीं लिया। कहा अगली दफे ले लेंगे। हाँ हमने देखा है कुएँ को प्यासे के पास चल के आते । कुएँ की भलमनसाहत है ये। २- एक हैं भगत ।परमानेंट के अतिरिक्त टेम्परेरी चौकीदार हमारे कालेज में। हम लोग खाना खाने के बाद टहल आते हैं कालेज तक।और कुछ हाल चाल कर आते हैं।  भगत रात की सभी लाइट जलाना बुझाना और घूम घाम के रखवाली करने का काम करते रहते हैं। एक बार की बात है। कैम्पस में पहली मंज़िल पर स्थित हमारे घर में क़रीब दो-ढाई मीटर धामिन (साँपकी प्रजाति)रात के क़रीब नौ बजे घुस आयी। सबके...

लखनिया दरी और चुनार के यात्रा संस्मरण

लखनिया ट्रिप ———— नदी किनारे की बसावट ने बनारस की महत्ता को बढ़ा दिया। व्यापार पनपे। शहरीकरण होता गया। अंगेरजों के समय में प्रशासनिक मुख्यालय बना। यहाँ की ख्याति ज़री के काम बनारसी साड़ी और बनारसी पान के लिए रही। तीर्थ और ज्योतिर्लिंग, महाशमशान , मुक्तिधाम इत्यादि विशेषताओं के कारण शहर की बसावट घनी और विस्तृत होती गई। यहाँ के लोग सुबह उठकर गंगा स्नान पूजा पाठ तीर्थ की परिक्रमा और दान पुण्य में रमने लगे। अनेकों कला संस्कृतियों को पालने पोसने लगा ये शहर बनारस।  माला फेरने और बुतखानों से मन भरा तो लोग पंचकोशी परिक्रमा करते, तीज त्योहार और सावन के मेले लगते। सारनाथ बौद्ध मत का तीर्थ है ही। जैन और तिब्बती के लिए भी तीरथ है। धीरे धीरेसमय बदला हवा से बातें करने वाली गाड़ियां और हवाई बातें करने के लिए मोबाइल आ गए। चौड़ी चिकनी सड़कों ने बनारस के लोगों में एक और शौक़ विकसित कर दिया है । वह है - लांग ड्राइविंग का आनंद लेते हुए ‘लखनिया दरी’जाना यह साइट बड़ी तेज़ी से पिकनिक स्पॉट के रूप में पसंद की जा रही है । दरी यानि जलप्रपात, झरना। यूँतो ये जगह  मिर्ज़ापुर जनपद में है ।मिर्ज...

करें योग रहें निरोग

योग ..... गणित चाहे जितनी कमज़ोर हो आपकी पर प्रकृति से जोड़ घटाव (योग संयोग) करते चलिए। कम मौक़े मिलते हैं जब हम खिल कर हँसते हैं। उन्मुक्त हँसी हमारे शरीर में बन रही गाँठों को खोल देती है। लचीलापन हड्डियों की कड़क मिज़ाजी को कम करता है।  प्रकृति के विभिन्न रूपों को धरते (सर्प भुजंग, शशक, वृक्ष ) हम अपने अकड़ चुके अंगो को दुरुस्त करते हैं। मन की आँखों से जब हम साँसों के उतारचढ़ाव की ओर नज़र करते हैं तो यक़ीन नहीं होता कि कैसे एक दिन हम साँसे लेना भूल जाएँगे और हमेशा के लिए कुंभक(साँसों की रुकी अवस्था) लग जाएगा। कुल मिलाकर जीवन की इस कला को सीखते जाना। नित दिन निस्वार्थ भाव से कोई काम करने का संकल्प सामजिकता को ज़िंदा रखने के लिए कम नहीं है। मेरे पेट की चरबी कम न हुई। मेरा वज़न सत्तर पर टिका है। पर बिना वजह मैं अपने भारतीय योग संस्थान द्वारा संचालित केंद्र जाना नहीं छोड़ती।यहाँ एक अपना परिवार बन गया है। जिनसे मिलने को जी करता है। मिलने मिलाने की इच्छा बनी रहे। बस हमारे लिए यही योग है। आवाहन करें योग रहें निरोग 21/06/2019 भारतीय योग संस्थान ,लखीमपुर खीरी

प्रशासनजिन्नाबाद

किसी के साथ गाड़ी में बैठ के जाने पर , एक बारगी हो सकता है कि अस्त व्यस्त ट्रैफ़िक व्यवस्था पर हमारा ध्यान न जाए किंतु कमबख़्त हम ख़ुद ड्राइविंग सीट पर हों तो वाहनों के रेले से जूझते हुए हमें अपना सफ़र पूरा करना ही होता है। ऐसे में अब ये हम पर है कि हम मज़े लें या झुँझलाते हुए गाड़ी चलायें। आज अपने शहर की एक सुखद तस्वीर देखी। लखीमपुर ओवरब्रिज पर रेलवे स्टेशन के पास जहाँ अक्सर बेतरतीब वाहन गुत्थ्म्गुत्था हो जाते हैं, वहाँ अस्थायी डिवाइडर्स लगाके ट्रैफ़िक को नियंत्रित क रने का परिवहन व यातायात विभाग का प्रयास सराहनीय लगा।एक बार वाह तो बनता है।वजह जो भी हो। वैसे एक बात बतायें। हेलमेट लगा के टू व्हीलर चलाने में और डर लगता है चश्मा और हेलमेट का तालमेल नहीं बैठता। मुआफ़ी की इल्तजा के साथ अपनी एक ग़लती बताएँ कि थोड़ी सख़्ती और होती तो हमारा चालान ज़रूर कटता। हमने गाड़ी से हेलमेट नहीं निकाला था। हमेशा हम प्रशासन को कोसते रहें ,ये ठीक नहीं। अच्छे काम की सराहना भी करें। # प्रशासनजिन्नाबाद  (ये रेणु की मैला आँचल से लिया शब्द है) 10/07/2019 Lakhimpur kheri

आर्टिकल 15 फ़िल्म समीक्षा

आर्टिकल 15 का सच “कहब त लग्ग जाई धक्क से , धक्क से “ पर कहना है। हफ़्ते भर के इंतज़ार के बाद अंततः फ़िल्म देख ही लिया। दिन में 1:45 बजे एकमात्र शो चलना था और उसमें भी बमुश्किल पचास दर्शक रहे होंगे। मेरा फ़ेस्बुक इस फ़िल्म की एक से बढ़कर एक समीक्षा से भरा हुआ था। ऑनलाइन बुकिंग की कोशिश में लगता था , फ़िल्म हाउसफ़ुल चल रही होगी। किंतु वास्तविकता कुछ और थी। असल में दर्शक न मिल पाने की वजह से फ़िल्म स्क्रीन पर दिखायी ही नहीं जा रही थी। ये हाल है हमारे शहर का। समाज की अनेक विद्रूपताओं को दिखाती ये फ़िल्म मन में कई तरह की कुलबुलाहट पैदा करती है।हालाँकि कोई भी सीन ऐसा नहीं है जिससे हम अनभिज्ञ हों। किंतु समाज की अनेक बदसूरत व्यवस्थाओं , ख़ासकर वर्ण व्यवस्था पर चोट करती है। एक भी ऐसा क्षण नहीं जबकि आपको उबन महसूस हो। इतना कहूँगी कि गौरव सोलंकी और अनुभव सिन्हा ने फ़िल्म बनाकर हिम्मत का काम किया है। ग़नीमत है किसी तबके से अभी तक इसके विरोध में प्रदर्शन नहीं शुरू हुआ है। फ़िल्म का फ़िल्मांकन और साउंड बेहद दिलकश है। गौरा के रोल में सयानी गुप्ता और ब्रह्मदत्त सिंह के रोल में ‘इनफ़ैक्...

(विश्व जनसंख्या दिवस) 11जुलाई

इंतज़ार कीजिए आप क़तार में हैं (विश्व जनसंख्या दिवस) ............ युवराज दत्त महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी , हमारा महाविद्यालय । सत्र 2019-20 की प्रवेश प्रकिया अपने चरम पर है। गेट के बाहर से भीतर तक ख़ूब गहमा गहमी। इस बार सिस्टम कम्प्यूटराइज़ किया गया है। नौसिखुए की तरह यह भी कभी कभी गड़बड़ कर रहा। और बैंक की तरह हम भी कहते हैं- ‘सर्वर डाउन है, क्या करें। लगे हुए हैं इस उम्मीद में कि अगले साल हम प्रवेश प्रक्रिया को और भी सहज, कम्प्यूटराइज फ़्रेंड्ली कर पाएँगे। एक कहावत है “आधे में बनारस आधे में भेलूपुर “ ये भेलूपुर मतलब “बी॰ए॰ की कमेटी” पहली मेरिट सूची , दूसरी मेरिट सूची, जनरल , ओ॰बी॰सी॰, एस सी, एस टी, दिव्यांग , क्रीड़ा प्रवीण, एन॰सी॰सी॰, गर्ल्ज़ सूची ऊपर से द्वितीय वर्ष और फ़ाइनल के छात्रों का प्रवेश अलग से। कितने तरह की सूचियाँ और इसके बीच में उलझे हैरान-परेशान , कर्मठ प्रवेश समिति के शिक्षक और सहायक कर्मचारी। कोशिश रहती है कोई बच्चा छूट न जाय। दूसरी ओर दूरदराज़ से प्रवेश के लिए आए बेचारे छात्र और छात्राएँ भी कम हैरान परेशान नहीं हैं ।छात्र-छात्राएँ अनजाने से चक्रव्यूह में घु...

डिजिटल इंडिया

राम चन्द्र कह गए सिया से,एक दिन कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना तिनका,कौवा मोती खाएगा |  सभी मैनेजर जानकार हों  हर तरह के बैंकिंग मामले के , हमेशा सच नहीं होता। एक वाकया है। नए ATM कार्ड का नया पिन बनाना था। पहुँच गए  नज़दीकी ए टी एम । यही कोईपाँच बजे का समय। एक दो कोशिश के बावजूद  हम नाकाम रहे  पिन जेनरेट करने में । तभी भारी नक़दी के साथ मैनेजर पहुँचे । बोले आप उधर बना लीजिए । हमें कैश भरना है। हम लोग हट गए ।  थोड़ी देर में शटर उठा । उनसे पूछा। क्या करें। वो अंदर लिखे इन्स्ट्रक्शन पढ़ते रहे  । फिर कहे अरे फ़लाँ लड़का बता देगा। थोड़ी देर में ही  बैंक में दिहाड़ी पर काम करने वाला लड़का आया और फटाफट बताया- ये ये ये ये । लो बन गया पिन और  पाँच सौ  रुपए निकाल कर तस्दीक़ भी कर लिया कि सही काम कर रहा है पिन। ये फ़र्क़ है थ्योरी और प्रैक्टिकल का।

अर्धकुम्भ 2019 प्रयागराज, आँखिन देखी

कुम्भ 2019-  पहला दिन, 07/02/2019 कुम्भ को विषयगत तौर पर जानने की हमारी उत्कंठा ने अंततःहमें वहाँ पहुँचा ही दिया स्नानार्थी नहीं बल्कि जिज्ञासु विद्यार्थी के रूप में। दिव्यकुम्भ 2019 । अर्धकुम्भ। प्रयागराज। भगवा रंग वाली कुम्भ शटल बसें हमें जोश दिला   रही थीं   इस स्लोगन के साथ - “ यू पी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा ”  मन में कई प्रश्न आख़िरकार क्या है कुम्भ।पौराणिक कथाओं से इतर ।   होटल , टेंट   का पता करने के बाद अंततः सिविल लाइन में होटल बुक करना ही अपनी जेब के लिए सुटेबल था।जबकि क्वासी रेट की तर्ज़ पर होटलों ने भी अपनी क़ीमत तेज़ कर दी थी। संगम क्षेत्र में अच्छे टेंट की क़ीमत प्रतिदिन १० , ००० थी ,वो भी तथाकथित  इस ग़रीब देश में।इसलिए मन मार के होटल में रुके। एक गाड़ी यहीं से ले लिया था। मालूम था कितनी भी दिव्य व्यवस्था हो , पैदल चलना ही पड़ेगा। पहले दिन हम दो बजे तक होटल में सामान रख के ,...