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अपनी होली हो री

कल से ही होली,मोबाइल पर उँगलियाँ सरकाते और किचन में  कलछी पलटा चलाते  मनाई जा रही है । दही बड़े ,कचौड़ी  , मालपूआ ,पूड़ी के साथ साथ मुर्ग़ा की तैयारी है। हम नहीं खाते तो क्या घर में और लोग प्रेमी हैं टंगड़ी के।पूरा मोबाइल  रंगारंग हुआ पड़ा है। घर परिवार में  फ़ोन से बधाई ली और दी गई।टीवी पर होली गीत जारी है।  मैंने ध्यान दिया  सुबह चिड़ियों की  चहचआहट बढ़ गई है।पार्क की क्यारियों में तरह तरह के फूल  ऐसे दिख रहे मानों किसी ने रंग बिरंगे गुलाल बिखेर दिया हो। सामने वाले पीपल के पेड़ पर कुछ कोपल, किसलय, नयी पत्तियाँ आ चुकी हैं, आम बौराया है। सेमल लाल फूलों से लदा है, मनोकामिनी ख़ुशबूदार सफ़ेद फूलों से भरा है, वहीं नीम अपनी सूखी पत्तियाँ गिरा रहा है। और मन फागुन हुआ जा रहा है। बावजूद इन सबके सुबह से ही अगर हमारे पड़ोसी बच्चे ,बच्चियाँ ,महिला ,पुरुष होली खेलने न आते तो रंग का त्योहार  सूना ही रहता। गुझिया मिठाई  प्लेटों में सजी रह जाती। हमने भी उनके साथ ख़ूब खेली होली। अंत में वादा अगली होली का हो गया कि रंगों के साथ और ठनढई के साथ ख...