काली कोयल
अप्रैल की सुबहें चिड़ियों पक्षियों की चहचआहट सुनने के साथ ही शुरू हो रही है। तरह तरह के परिंदे , कुछ बच्चे कुछ बड़े , साथ में मनभाती हवा। पर आज एक जानी पहचानी आवाज़ ने मोबाइल कैमरा ऑन करने पर मजबूर कर दिया । वो है काली-काली कू-कू करती, जो है डाली-डाली फिरती! कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी छिपी हरे पत्तों में बैठी .,..... जो पंचम सुर में है गाती वो काली कोयल कहलाती (अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’) कहाँ ?कहाँ? व्वो चंदन के पेड़ पर। पक्षी विज्ञानी ये मानते हैं कि नर कोयल ही गाता है। नीड़ परजीविता (यानि मादा कोयल दूसरे पक्षियों के घोसले में अपने अंडों को रख देती हैं अपना घोंसला नहीं बनातीं) इस कुल के पक्षियों की विषेशता है। २९ April कभी ऐसा लगता है कि वो आम को बुला रही है और पूछ रही है खा हो। कआं,कआं ...कआं.... बहर हाल२०-२५ दिन से वो अपना डेरा जमाये हुए है। २४ मई२०१८ एक महीने होने को आए कोयल का डेरा जमा हुआ है । लगता है पके आमों का स्वाद ले के ही जाएगी। इसी बीच आज पीपल के पेड़ पर चिड़ियों की आवाज़ कुछ जयादौ ही लगी । हमने AC ब...