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Showing posts from April, 2018

काली कोयल

अप्रैल की सुबहें चिड़ियों पक्षियों की चहचआहट सुनने के साथ ही शुरू हो रही है। तरह तरह के परिंदे , कुछ बच्चे कुछ बड़े , साथ में मनभाती हवा। पर आज एक जानी पहचानी आवाज़ ने मोबाइल कैमरा ऑन करने पर मजबूर कर दिया । वो है काली-काली कू-कू करती, जो है डाली-डाली फिरती! कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी छिपी हरे पत्तों में बैठी .,..... जो पंचम सुर में है गाती वो काली कोयल कहलाती           (अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’) कहाँ ?कहाँ? व्वो चंदन के पेड़ पर। पक्षी विज्ञानी ये मानते हैं कि नर कोयल ही गाता है। नीड़ परजीविता (यानि मादा कोयल दूसरे पक्षियों के घोसले में अपने अंडों को रख देती हैं अपना घोंसला नहीं बनातीं) इस कुल के पक्षियों की विषेशता है। २९ April कभी ऐसा लगता है कि वो आम को बुला रही है और पूछ रही है खा हो। कआं,कआं ...कआं.... बहर हाल२०-२५ दिन से वो अपना डेरा जमाये हुए है। २४ मई२०१८ एक महीने होने को आए कोयल का डेरा जमा हुआ है । लगता है पके आमों का स्वाद ले के ही जाएगी।  इसी बीच आज  पीपल के पेड़ पर चिड़ियों की आवाज़ कुछ जयादौ ही लगी । हमने AC ब...

गौसेवा के नाम पर पलते NGO

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कोई   गाय बचाएगा कोइ बछड़ा   और वो बचाएँगे ‘ पगहा ’  ये हाल है   एक गौमाता की सेवा का ढोंग दिखाने वाले एक NGO  का। घटना है कल यानि २८ अप्रैल की। सुबह से ही गाय  ‘ बेचारी ’ दिख रही थी। धीरे धीरे चल रही है कभी इधर कभी उधर । शाम तक   गाय एक बच्चे को बियाई   । उसके मालिक का कोई अता पता नहीं .  मुझे याद है हमारे गाँव में गाभिन गाय या भैंस की देखभाल गर्भवती बहुओं से कम नहीं होती थी। और बच्चा देने के बाद शुरू में भी बहुत देखभाल की जाती थी।गुड़ पका के या और भीकई चीज़ें खिलाई जाती। कालोनी के लोग   उसकी निगरानी करते रहे कि कुत्ते बछड़े को नोच न खाए .  शुरू हुआ किसको सौंपा जाय यहाँ उसके लिए नाद - चारा कुछ भी तो नहीं   कई जन प्रतिनिधियों , पत्रकारों से सम्पर्क किया गया। पता लगा एक NGO का । फ़ोन किया गया बोला उन्होंने , अभी पहुँचे और आधा घंटे में एक पगहे के साथ हाज़िर । मन में एकदम से सम्मान के विचार आ गये । ...

आइस पाइस

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वही खेल   वही खेल   का मैदान क्रिकेट , बैड्मिंटन ,  फ़ुट्बॉल , आइस-पाइस, झगड़े  - सुलह ,  कुट्टी - मीट्ठी , बीच बीच में सुस्ताना   फिर नए खेल की योजना बनाना , टॉस के लिए सिक्के कहाँ कोई  टुकड़ा  काग़ज़ का  उछाल देना , गेंद का झाड़ी में अटकना ,  दलदल में जाना ,   वो घुस के कीचड़ में किसी जाँबाज़ लड़के का   जा के गेंद निकालना   कभी रखना तेल के जलते दिये कभी दामन को भर देना  रंगों की फ़ुहारों से कुछ भी तो नहीं बदला है   कभी देखा है ?  फिर से ग़ौर किया है ? भरी दोपहरी कनेर   की शाख़ों पर   अड्डा जमाये   अपना, आसमान को छू लेने का रोमांच ,  हो - हल्ला करते हुए अचानक तेज़ दौड़ लगाना ये भी करते हैं,वो भी करते थे बदले  हैं तो बस चेहरे और नाम . इस अहाते में खेलते हुए दूसरी पीढ़ी आ चुकी है . छोड़ के अपने खेल के मैदान   एक पीढ़ी जा चुकी है , अनज...