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Showing posts from October, 2019

माँ के सच्चे दरबार की जय

माँ के सच्चे दरबार की जय।जय शेरा वाली। जय महिषासुर मर्दिनी। सारी रात जगराता चलेगा। फ़ुल साउंड, डीजे।खुली सड़क पर, टेंट लगा के। सड़क हमारी है , हम जो चाहे करें। हमारे सरकारी मकान की खिड़कियों दरवाज़ों की हर दराज से भक्ति आ ही जाएगी। सिर दर्द और दिल की धड़कन तेज़ होने तक। कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण पर कुछ आदेश जारी किया था। हम आदेश को फ़ाइलों में दबा के और भाषणों और समारोहों में जीवित रखेंगे। समाज सेवी मयंक श्रीवास्तव जी बताते हैं-  इतिहास में जो समय मध्यकाल है वही हिंदी के इतिहास में भक्ति काल का है। भक्ति का इतिहास कितना पुराना है इसे बता पाना इसलिए कठिन है कि कोई लिखित इतिहास इन सन्दर्भो में नही है। भक्ति ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है । इधर दो दशकों से एक नई भक्ति उपजी है जो तेज़ आ वाज़ों सुंदर सजावटों और चन्दो पर आधारित है जिसमे बाजार की पूरी स्वीकृति है किताबे तस्वीर , गमछा, सुंदर लाइटे अच्छे टेंट यहाँ तक इवेंट ऑर्गनाइज़र इन कामो में लगे हैं किंतु भक्ति की आंधी के आगे सभी नतमस्तक है । इसमें कोई भी पन्थ किसी से भी पीछे नही और बाजार को चाहिए क्या एक नियंत्रित ...

“प्लास्टिक बॉटल नहीं चलेगी”

ये मुहिम हमने अपने ‘इनरव्हील क्लब लखीमपुर नव दिशा’के उन संगी साथियों में चला रखी है, जो सक्षम हैं। हमारी दोस्त इसमें अपना सहयोग दे रही हैं। आप चाहें तो आप भी शामिल हो सकते हैं। आप सभी के लिए एक घर बैठे प्रोजेक्ट है ।जिसमें सभी शामिल हों। प्रोजेक्ट का नाम है “प्लास्टिक बॉटल नहीं चलेगी” आप जानते हैं इनर व्हील क्लब अपने भावी पीढ़ियों के लिए पर्यावरण जागरूकता के विभिन्न कार्यक्रम चला रहा है , और नवदिशा क्लब उस अभियान को सफल बनाने में जी-जान से जुटा हुआ है। बताने की आवश्यकता नहीं कि प्लास्टिक कितना नुक़सान देह है और उसमें खाने पीने की चीज़ें रखना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। आपको करना ये है की- १- प्लास्टिक मुक्त फ़्रीज़ बनाना है। इसके लिए आप अपनी फ़्रीज़ से प्लास्टिक के बॉटल हटा कर उसकी जगह मेटल या शीशे की बॉटल इस्तेमाल करें। धीरे धीरे एक बॉटल से शुरुआत करें।और उसके साथ की फ़ोटो हमें भेज दें। इस मैसेज के साथ “प्लास्टिक बॉटल नहीं चलेगी” फ़्रीज़ के बाद धीरे धीरे घर को प्लास्टिक मुक्त करें। सभी खाने वाले सामान प्लास्टिक में रखना बंद कर दें। तो फिर इंतज़ार किसका !!! ...

जियुतिया(जीवित पुत्रिक़ा) व्रत के बहाने थालपोस कथा

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पूरब के क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले कठिन व्रतों में से एक ये व्रत भी है। क़रीब 30 घंटे का निर्जला व्रत। पता नहीं कौन रीत चला गया।धीरे धीरे ये कर्मकांड और भी बढ़ रहा बल्कि गाजे बाजे के साथ हो रहा है। बैंड बाजा के साथ त्योहार मनाना तो अच्छी बात है। पर कठिन व्रत रखना , मेरी समझ के बाहर। और हमने अपने रखे जाने वाले व्रतों के लिए अपनी समझाईश पुख़्ता कर ली है। कोई भी व्रत फलाहर ही रखते हैं। ससुराल में हमारी सासु माँ कहती रह गईं पर किसी बहू ने हिम्मत नहीं किया इस व्रत को शुरू करने की। अब बीमार पड़ जाएँ चाहे लस्त पस्त हो जाएँ पर जिसने व्रत करना शुरू कर दिया तो पुत्रों की चिरायु की कामना के लिए ये व्रत छोड़ती नहीं। इस डर से कि कोई अनहोनी न हो जाय।परम्पराओं को तोड़ना छोड़ना आसान नहीं। गाँव हो शहर। इनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं बनारस में आलम ये है कि घरों में काम करने वाली सभी सहायिकाएँ इस व्रत के लिए 2से 3 दिन की छुट्टी लेती हैं। बेटा चाहे दारूबाज़ हो या और भी ग़लत आदतों को पाले हो पर इन्हें समझाना मुश्किल है कि व्रत नहीं (सपरता) होता तो ना रखो। कहेंगी “जियूतिया माई जब...

हस्तलिपि/ चिट्ठी/धरोहर

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आज ख़ज़ाना मिल गया। दिवाली यूँ ही आने की आहट नहीं देती। इतनी सुंदर लिखावट। पत्र मिलने और कई दिन उलट पुलट पढ़ने की ख़ुशी। एल्बम की तरह देखने का आनंद। ज़माने के साथ हम भी बदल गए । अब लिखने में उँगलियाँ दुखने लगती हैं। अब वे उँगलियाँ कीपैड पर कभी कभी मात खा जाती हैं। अब सुन रहे कीबोर्ड और कीपैड भी जा रहा है । आगे आगे देखिए होता है क्या। होने दीजिए। “रक्षा करते हो नीरस अतीत की जैसे वैसी नीरसता तुझमें बनी रहेगी” कोई कहता रहे । हम भविष्य के लिए अतीत भी बचाएँगे और वर्तमान भी। ये लिखावट है हमारे सुपरवाईजर ड़ा० अशोक कुमार शाही जी की\ इस फ़ोटो में अल्पिका की लिखावट। # हमारीधरोहर   # hastlipi   # chitthi -1 07/10/2019

pluto

1- किसना एक छोटा बच्चा था। उसने पिछले साल दशहरे के मेले से एक तोते का बच्चा ख़रीदाऔर साथ में पिंजरा भी ले लिया। नाम रक्खा ‘मिट्ठू’ बहुत ख़ुश ।कभी पिंजरा घर में कभी बाहर अमरूद के पेड़ पर। स्कूल जाने के पहले और वापस आते ही मिट्ठू की हाल चाल लेता।लेकिन मिट्ठू था कि बोलता ही नहीं। पिंजरे में घूमता रहता।खाना पीना मन हुआ खा लिया नहीं मन तो छुआ ही नहीं। किसना परेशान। कभी उसे नहलाता तो कभी घर के अंदर फुदकने को छोड़ देता। सोचता मिट्ठू से बात करे, पर मिट्ठू कुछ बोलता ही नहीं। थोड़े दिन बाद तोते के पंख झड़ने लगे। किसना दुखी हो गया। उसे दया भी आने लगी । कहीं उसने पढ़ा कि पिंजरे में क़ैद पक्षी ख़ुश नहीं होते। ये जानकर उसने एक दिन पिंजरा खोल दिया । पर ये क्या मिट्ठू ने तो बाहर की दुनिया देखी नहीं । इसलिए पिंजरा खुला होने पर भी वह बाहर निकला ही नहीं। किसना ने फिर से पिंजरा बंद कर दिया कि कहीं बिल्ली न खा ले उसे। अब किसना ने क़सम ली कि अब कभी पिंजरे में बंद पंक्षी नहीं ख़रीदेंगे। आज़ादी सभी के लिए ज़रूरी । चाहे इंसान हो या पशु-पक्षी। 2- माँ- अपने तीन साल के बेटे से बेटा !पंद्रह अगस्त को झंडा क्...