हस्तलिपि/ चिट्ठी/धरोहर

आज ख़ज़ाना मिल गया।
दिवाली यूँ ही आने की आहट नहीं देती।
इतनी सुंदर लिखावट। पत्र मिलने और कई दिन उलट पुलट पढ़ने की ख़ुशी। एल्बम की तरह देखने का आनंद। ज़माने के साथ हम भी बदल गए । अब लिखने में उँगलियाँ दुखने लगती हैं।
अब वे उँगलियाँ कीपैड पर कभी कभी मात खा जाती हैं। अब सुन रहे कीबोर्ड और कीपैड भी जा रहा है । आगे आगे देखिए होता है क्या।
होने दीजिए।
“रक्षा करते हो नीरस अतीत की जैसे
वैसी नीरसता तुझमें बनी रहेगी” कोई कहता रहे ।
हम भविष्य के लिए अतीत भी बचाएँगे और वर्तमान भी।
ये लिखावट है हमारे सुपरवाईजर ड़ा० अशोक कुमार शाही जी की\

इस फ़ोटो में अल्पिका की लिखावट।




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