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Showing posts from March, 2018

पहली अप्रैल

“ होंगी   जमाने   भर   की   डिग्रीयाँ   तुम्हारे   पास छलकते लफ्ज़ आखों के   न पढ़ पाये तो अनपढ़ हो। ” कहीं से ये मैसेज मिला था ऐसे अनपढों को पढ़ाने का दिन है - पहली अप्रैल April का पहला दिन । सबको बेवक़ूफ़ बनाने का आनंद लिया जाता है . कभी कभी ये आनंद देता है जबकि कभी कभी नाराज़गी या झगड़े की वजह भी बन जाता है। याद है बचपन में सबसे पहले मिट्टी का दही बड़ा बना के पापा को ही फूल बनाया गया . लेकिन April fool के   ख़तरनाक विचारों से अनभिज्ञ पापा जो नाराज़ हुए तो माहौल ही थोड़ा कसैला हो गया।   फिर स्कूलों में यदा कदा किसी को फूल   बनाने के   कई वाक़ये ज़ेहन में दर्ज हैं । सबसे मज़ेदार   घटना चकिया की है । पड़ोस में एक चाचा रहते थे । ब्लाक प्रमुख। बच्चों के साथ अक्सर बच्चे बन जाते । उनको पहली एप्रिल को बेवक़ूफ़ बनाने की योजना बच्चों ने बनायी। मिठाई का ख़ाली डिब्बा ले के ब...

सिलउटी कुटाय ल्येओ सिलउटी

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सिल पर पिसती हुई पुदीने और टिकोरे की चटनी । आह।  गरम  गरम रोटी सब्ज़ी और चटनी ।  ख़ुशबू जीभ में पानी   ला देता है. त्त्ता त्त्ता  । चटकारे लीजिए। लीजिए। त्त्ता । नमक के साथ टिकोरा (अमिया) खाके , एक आँख दबा के चटकारे लीजिए।बचपन मे जरूर लिया होगा स्वाद टिकोरे का। शुरू शुरू में सिल कुटाई से कम महंगा टिकोरा नहीं होता  है। अबहीन दुई दिन पहिलहीं त सिल कुटावल गयल हव । पूरे २० रुपया में , सिल और लोढ़ा। लखीमपुर शहर में इसे सिल को“सिलउटी’ और लोढ़े को ‘बट्टा’ बोलते हैं। जबकि ग्रामीन क्षेत्रों में सिल-लोढ़ा कह्ते हैं और पीसने को ‘बांटना’ भी बोलते हैं। पत्थरकट्टवा पूरे तीस रुपया माँग रहा था । मोलभाव करने पर बोला चावल दे दो । हमने कहा कौन खेत से आ रहा है ये लो बीस रुपया। पड़ोसी ने भी कहा  ये बढ़िया नहीं कूट रहा। इसकी छेनी सही नहीं। ग़रीबों के साथ मोलभाव न करने का ज्ञान ग़ायब हो गया था उस समय। अब आगे से हम पत्थरकटवा से मोलभाव नहीं करेंगे।  क़सम से। और सुनिए! आप भी मत करिएगा मोलभाव। #ख़ुदपरहिक़ारत

पुल पर उतरता है बसंत धीरे-धीरे

हम  साफ़ सुथरा शहर चाहते है। अपन का शहर। स्वच्छ शहर। स्मार्ट शहर। पर एक  यक्ष प्रश्न  यह है कि साफ़ होगा या रहेगा कैसे। मार्च का आख़िरी हफ़्ता । अचानक कहीं डेंटिंग पेंटिंग होते दिखना कोई आश्चर्य की बात नहीं। एक जगह दिखा ओवर ब्रिज  की बाउंड्री दीवार पर ज़ेब्रा  टाइप वाली पट्टियाँ रंगी जा रही हैं । तीन लड़के हैं । निर्विकार भाव से। जल्दी जल्दी बिना रुके काम निपटाते हुए। एक के हाथ में लोहे की पत्ती है जिससे वह  दीवार पर चिपके पैम्फ़्लेट खुरच के छुड़ा के एक कपड़े से झाड़ दे रहा है। नीचे तरह तरह के विज्ञापन के फटे नुचे काग़ज़ के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। दूजे के हाथ में सफ़ेद पेंट का डिब्बा और ब्रश है। उससे वह सफ़ेद पट्टी पेंट कर दे रहा है। तीसरे  के हाथ में काले पेंट का डब्बा और ब्रश। उससे वह पीली पट्टियों को काले रंग से पोत रहा है। कल तक पेंट हो के ओवरब्रिज कुछ चमकने लगेगा। हम क्या करेंगे? अव्वल ,गाड़ी से चलते हुए पान  या गुटका की पीक को उसी दीवार पर पीक के कहेंगे ।  “यार ययु तो बड़ा खबसूरत लगि रहा।” दूसरे, किसी कोचिंग या और स्टार्ट ...

उच्च शिक्षा का नमूना -चार

कहानी फिर दोहरायी गई इस बार   एक महाविद्यालय में अर्थशास्त्र का एक दिन  पुराना    पर्चा इतिहास की छात्रा   ने   १५ - २० मिनट हल किया और जब उसे इतिहास का पेपर दिया गया तो बिना शिकायत , बिना पूछताछ उसे हल करने लगी .  क्या लिखा होगा , ज़रा  अन्दाज़ा लगाइए . बेटियाँ कितना पढ़ रही हैं कितना बढ़ रही हैं कहा नहीं जा सकता. दूसरी घटना आज एक लड़का   ( लड़का इसलिए कह रहे कि वह विद्यार्थी नहीं है ) परीक्षा देने आया .  कमरे में  सीट न मिलने पर   बाहर गेट पर आया . मैंने पूछा क्या बात है तो बताया . आज मेरा पेपर नहीं . मैंने   प्रवेश पत्र देखा . वह बालक तीन विषय   हिंदी साहित्य , इतिहास और राजनीति विज्ञान और पर्यावरण ( अनिवार्य विषय ) की परीक्षा दे चुका था . अब उसके   सभी पेपर हो चुके थे . क़ायदे से उसे परीक्षा ख़त्म होने का जश्न मनाना चाहिए था . लेकिन उसे यह पता ही नहीं । वह   इतिहास विषय  ...

उच्च शिक्षा का नमूना-३

परीक्षा शुरू होने के पहले   एक लड़का कर्मचारियों से उलझा हुआ था ।   मेरी सीट   क्यों नहीं लगी है कमरे में . रोल नम्बर नहीं मिल रहा है। अपने साथ स्कीम की एक कॉपी भी लिए था . दिखाया , देखिए आज मेरा पेपर है .  कर्मचारी ने बताया भाई ये परीक्षा   कल हो चुकी   है। वो लड़का उलझता रहा . उसकी परीक्षा छूट गई थी ,सो वह  हैरान-परेशान. स्कीम ले के   ज़रा ध्यान से देखा   गया तो   स्पष्ट हुआ कि वह   पिछले  वर्ष   की स्कीम डाउनलोड करवा लाया था . यहाँ झोल उच्च शिक्षा व्यवस्था   में है या डिजिटल इंडिया में?  या फिर कौशल विकास में? सवाल क़ाबिल - ए ग़ौर है .  इसी बीच ख़बर आयी कि   एक विश्वविद्यालय के  स्नातक कक्षाओं  के प्रश्नपत्र में सेलेबस से बाहर का प्रश्न पूछे जाने से छात्रों ने परीक्षा का बहिष्कार किया।   जहाँ इस बात से राहत महसूस किया गया कि कम से कम छात्र अपना सेलेबस जानते ...