पहली अप्रैल
“होंगी जमाने भर की डिग्रीयाँ
तुम्हारे पास
छलकते लफ्ज़ आखों के
न पढ़ पाये तो अनपढ़ हो।”
कहीं से ये मैसेज मिला था
ऐसे अनपढों को पढ़ाने का दिन है -
पहली अप्रैल
April का पहला दिन । सबको बेवक़ूफ़ बनाने का आनंद लिया जाता है . कभी कभी ये आनंद देता है जबकि कभी कभी नाराज़गी या झगड़े की वजह भी बन जाता है।
याद है बचपन में सबसे पहले मिट्टी का दही बड़ा बना के पापा को ही फूल बनाया गया . लेकिन April fool के ख़तरनाक विचारों से अनभिज्ञ पापा जो नाराज़ हुए तो माहौल ही थोड़ा कसैला हो गया।
फिर स्कूलों में यदा कदा किसी को फूल बनाने के कई वाक़ये ज़ेहन में दर्ज हैं ।
सबसे मज़ेदार घटना चकिया की है । पड़ोस में एक चाचा रहते थे । ब्लाक प्रमुख। बच्चों के साथ अक्सर बच्चे बन जाते । उनको पहली एप्रिल को बेवक़ूफ़ बनाने की योजना बच्चों ने बनायी। मिठाई का ख़ाली डिब्बा ले के बच्चे उनके पास पहुँचे ।उन्होंने डिब्बा खोला जिसमें मिठाई की जगह एप्रिल फूल की पर्ची लिखी मिली । बच्चे ताली बजा के हसने लगे ।
बुद्धू बनाया ,बड़ा मज़ा आया।
बुद्धू बनाया ,बड़ा मज़ा आया।
थोड़ी देर चाचा देखते रहे फिर वे भी ताली बजाने लगे और ख़ुश होके कहने लगे,
बुद्धू बन गये, बुद्धू बन गए।
मिठाई खिलाओ भाई । हम बुद्धू बन गए । अब आश्चर्य की बारी बच्चों की थी। आपस में एक दूसरे की ओर देख कर इशारों में बोले बच्चे , ये तो सच्ची मुच्ची के बुद्धू हैं।
मिठाई आयी। सबने मिठाई खायी।
उस समय नहीं समझ आया।
आज समझ आता है
छोटी छोटी बातों में से आप अपने लिए कैसे ख़ुशियाँ चुरा सकते हैं। ब्लाक प्रमुख चाचा की तरह , ख़ुश रहने का हुनर हम सीख सकते हैं।
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