Posts

Showing posts from February, 2018

देश मेरा रंगीला

Image
देश मेरा रंगीला ......... ‘’ सर जो तेरा चकराये   और दिल डूबा जाए , आजा प्यारे , पास हमारे , काहे घबराए काहे घबराए . ‘’ प्यासा फ़िल्म का रफ़ी साहब का गाया और जानी वाकर पर फ़िल्माया ये   मशहूर गीत   आपने सुना होगा .  जानी वाकर जैसे दिखते एक शख़्स अपने शहर के ओवेरब्रिज के नीचे निर्माणाधीन बड़ी रेलवे लाइन के पास काफ़ी दिनो से एक साइकिल पर अपनी दुकान सजाए दिन भर बैठे मिल जाएँगे . एक छोटा स्पीकर . बजता रहता है  . “ आइए जनाब लीजिये   कल्याण दंत मँजन   एक बार दाँत पर रगड़िए दाँत मोतियों से चमक जाएँगे . पायरिया हो , मुँह की बदबू से   परेशान हों , छुटकारा पाइए .  कल्याण   दंत मँजन . दाँत   में दर्द हो , मसूड़ों में   सूजन हो . कल्याण दंत मँजन . एक बार ले जाइए बार बार ले जाएँगे . कल्याण दंत मंजन .” हालाँकि जनाबके ख़ुद के मुँह में   हैं गिनती केदाँत वो भी काले . जो बामुश्किल दिख रहे थे .  ...

यू पी बोर्ड इम्तिहान

किसी ज़माने में यूपी में हाई स्कूल का इम्तिहान मतलब शहर परेशान . . हर दूसरे घर में किसी न किसी का बोर्ड इम्तिहान. तो हमारा भी था बोर्ड इम्तिहान.चंदौली में . जो हमारे समय में बनारस जिले की तहसील हुआ करता था . बाद में जनपद मुख्यालय बन गया. जैसे माएँ बच्चों को गब्बर का नाम ले के सुलाती थीं, उसी तरह हमारी टीचर ‘महेंद्रा’सेंटर का नाम ले के हम लोगों को डराती थीं. “ जाना महेंद्रा , तुम लोग, गर्दन हिलाने को नहीं मिलेगा” ठीक है भाई .गए महेंद्रा . हिंदी का पहला पेपर सुबह दे आए . और च ूँकि रात भर जाग के पढ़े थे तो आ के सो गए . ढाई बजे थे कि हमारे घर स्कूल की दो टीचर ललिता बहनजी और सिंह बहनजी पहुँची. अरे सो रही हो? वहाँ संगीत का पेपर है. हड़बड़ाए से किसी की साइकिल पर बैठा के भिजवाया गया. रोते गाते , बदहवास सी कुल १५ लड़कियाँ . सबको किसी न किसी तरह बुलवाया गया. टेलिफ़ोन का ज़माना तो था नहीं और न ही गाड़ी मोटर की सुलभता. स्कीम देखने में कुछ ग़लतफ़हमी हुई थी. हम लोगों के हिसाब से बाद में पेपर था किसी तरह सेंटर पहुँचे सब लोग. जैसे तैसे पेपर दिया गया. किताब , पर्ची से तब भी नक़ल नहीं करने दिया ...

आपन भासा आपन बोली

Image
आज मातृ भाषा दिवस ह. अ हमार भासा-बोली ह ‘भोजपुरी’ वैसे त देस परदेस घूम के हमरो भासा क खिचड़ी बन गयल ह . ननियऊरे से लेईके अजियउरे तक क असर बा. बाकि, हमके भोजपुरी बोलै  अऊर समझ में आवैला एकर खुसी ह. खिस्सा कहल गयल ह कि- “कोस कोस प पानी बदलै, चार कोस प बानी.” त हमरहू बोली में भोजपुरी, गाजिपुरी, बनारसी,  ज्ञानपुरिया, मिरजापुरिया  आज़मगढ़िया जइसन बोली क असर आइये जाला। हमके तन्नी मन्नी अवधियो  बोलय समझै आवैला. हँ, त हम बतावत रहली ह कि आज एक ठे इनार देखै के मिलल.  हम अपने सहेलिन के संगे घूम्मै गयल रहली. इ ह लखीमपुर जीला के मेंढक मंदिर के बहरि अलंग में.संकर भगवान के मंदिर गर्भगृह के  एक दम्मे दुआरी प.  बहुतै ऊँचवा प. इनारे से साफ़ पानी काढ़ के देवता के ऊपर जल चढ़ावै बदे बनल ह. मानता ई ह कि कुआँ में पानी ज़मीन के बरोब्बर ह.आसपास क़त्तों पानी एतना ऊपर ना ह.  इनार जौने कारीगरी से बनल ह पूछै वाला ना बा. एतना पतील की  कइसे खनायल होई,कैसे ईंटा जोड़ाइल होई आऊर कइसे सीमेंट क पलस्तर भयल होई. सोच के अचरज होला. मेंढक मंदिर पर फेर क़ब्बों बताईब.इ मंदि...

बसंती रिबन

बसंती रिबन ......... प्राइमरी स्कूल में वसंत पंचमी की पूजा  की तैयारी चल रही है चौथे कक्षा की चार लड़कियाँ  रामा , मंजू, मोहसिना और नूतन चुनी गयी सस्वती वंदना के लिए .ट्रेनिंग और रिहर्सल चल रही है . मास्साब हारमोनियम पर धुन निकालते हैं ‘जयति जय जय माँ सरस्वती जयति वीणा वादिनी।.. ...... कमल आसन छोड़ दे माँ देख मेरी दुर्दशा शांत की सरिता बहा दे , हे कमलदल वाहिनी।। पहला स्टेज शो.कुछ शरमाई, कुछ सकुचाई . लड़कियाँ वंदना याद करती हैं. चारों लड़कियाँ जैसा बताया जाता है ,गाने के बोल शुरू करती हैं. क्लास के और बच्चे  लड़के और लड़कियाँ  मुँह ढक के मुस्कुराना शुरू करते हैं. नज़र मिलते ही राग बेसुरा और  गाती हुई लड़कियाँ भी शरमाते हुए चुप हो गईं. डाँट पड़ी -देखो ! गाते समय  किसी ओर न देखो. बिलकुल सामने की दीवाल की ओर देखो. -जी माटसाब वंदना तैयार. सबको साफ़ धुली स्कूल ड्रेस पहन के आना है और  दोनो चुटिया में  बसंती रिबन. तब कहाँ पता था orange colour. -जी मेरे  पास नहीं है  माटसाब. एक ने कहा . -ठीक है  किनारे खड़ी दो लड़किया...

अम्मा की पाठशाला

यादों की गलियों में अम्मा की पाठशाला .......... ककहरे की पाठशाला के समानांतर दूसरी पाठशाला भी चलती रहती ,घर में. जाड़े गर्मी और बरसात में अलग अलग.  कभी कढ़ाई कभी बुनाई, कभी सिलाई . हालांकि यह १०वीं का अनिवार्य विषय था,फिर भी स्कूल से ज़्यादा गृहविज्ञान घर में सीखा.अम्मा की हेडमास्टरी में. दीदी लोग  जैसी सहायक अध्यापक भी थीं.कभी कभी डिप्टी साहब (पापा ) का औचक दौरा होता और मूड ठीक नहीं होता तो झट पट हम लोग ऊन सलाई  वग़ैरह छोड़ देते. तरह तरह के सहूर-गुन हम बहनें आपस में ही सीखते सिखाते. क्रोशिया, डेजीनीटर,यूपिन. दुसुत्ती ,  रुमाल, तकिया गिलाफ, पंखा पंखी, पापड़ चिप्स ,साथ में चाय पानी, खाना ख़ज़ाना. अक्तूबर के साथ ही ऊन सलाई  निकल आती . धीरे धीरे सीखने की प्रक्रिया चलती. पाठयक्रम  का ज़्यादा बोझ नहीं .न ही सत्र का दबाव.  घुटनों में  ऊन की लच्छी फँसा के ग़ुल्ले बनाना. फिर सीधा-उलटा बुनते  बनाते कब सलीक़े से फंदा डालना सीख गए पता ही नहीं चला.  नहीं पता चला एकरंगी नमूनों के साथ कब सतरंगी नमूने भी आसानी से बनाने लगे.मोज़े टोपी से लेकर ...