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Showing posts from April, 2019

आते जाते ख़ूबसूरत आवारा सड़कों पे

1- बनारस से लखीमपुर के बीच का सफ़र करते हुए पचीस साल से अधिक हो गया । अक्सर ठीक ठीक तय नहीं कर पाते हैं कि कौन दिल के अधिक क़रीब है ।   लखीमपुर पहुँचते ही कुछ अपना सा लगता है और बनारस पहुँचते ही फिर से वही अपनापन। बात मई 2018 की है।बनारस से वापस आ रहे थे।हमारा कुछ काम लखनऊ HDFC इन्श्योरेंस आफिस में था। हम सेंट फ़्रांसिस से मुड़कर हलवासिया पहुँचे । एक प्राइवेट पार्किंग में गाड़ी खड़ी की , लेकिन वहाँ काम कर रहे लड़के जो नशेड़ी और मनबढ़ लगे, बोले गाड़ी की चाबी हमें दे दीजिए। हम लोगों ने कहा क्यों दे दूँ ? बहुत क़ीमती न भी हो तो भी हमारे कई सामान इसमें हैं। तुम लोगों पर इतना यक़ीन नहीं कर सकते। नतीजा उन सबने पार्किंग में जगह देने से मना कर दिया। उनकी बातचीत का ढंग भी ख़राब था। थोड़ी खीझ और ग़ुस्से से हम लोग बाहर आए। वहाँ रहने वालों ने अपने घर के बाहर गार्ड रखे थे जो मना किए यहाँ गाड़ी खड़ी न कीजिए। अब हमने इत्मिनान से शीशा उतारा और एक नौजवान से दिखते गार्ड से बताया अपनी परेशानी । बातों को सुनते -सुनते गार्ड बड़े अपनेपन से बोला । दिमाग़ ख़राब है क्या उन लोगों का। चलें बतायें...

वेबसीरिज़ समीक्षा

1-मिर्ज़ापुर , जिस शहर से अपना नाता रहा हो उस नाम से वेब सीरिज़ आएगी सोचा न था। पंकज त्रिपाठी का नाम सुनकर देखना शुरू किया। कहानी ने ऐसा बाँधा कि फ़ाईनली पूरा नौ एपिसोड देख ही डाला। मज़े की बात अचानक ज़िक्र में पता चला बच्चे भी देख चुके हैं। बल्कि मज़ाक़ में छोटे बेटे ने बताया कि उसकी शक्ल से सब उसको बबलू पंडित बोल रहे हैं। बच्चों ने उसमें से क्या लिया क्या सीखा । उस पर कोई चर्चा नहीं की पर जो बात बार बार मन में चुभी वो है सेक्स के अंतरंग दृश्य।जिसे शायद बड़े पर्दे पर लाने में सेंसर लगता। फ़िल्म समीक्षक न होते हुए भी मेरा ये मानना है। मज़े हुए सभी कलाकारों में सबसे अधिक जिसकी ऐक्टिंग पसंद आयी वो है गुड्डू पंडित। सिनेमा और साहित्य समाज का दर्पण है अगर ये बात सत्य है तो मिर्ज़ापुर की स्क्रिप्ट मन को झकझोरने वाली है। वर्तमान समाज की असलियत अगर ये है , हमारे आसपास की आबोहवा ऐसी है तो निश्चय ही समाज के उन अनदेखे पहलुओं से हम अनजान हैं। नहीं चाहिए ऐसा समाज। बार बार महसूस हुआ हमें अपने युवा पीढ़ी को ग़लत रास्ते पर जाने से बचाना होगा । मारधाड़, सेक्स, नशा, तस्करी, माफ़िया मसाला से...

एक दिन बचपन के नाम

एक दिन बचपन के नाम .......... एक बात बतायें आप, यदि किसी छोटे बच्चे की उम्र पता करनी हो तो आप कैसे जान पाते हैं कि बच्चा लगभग पाँच साल या उससे अधिक का है। हमें उम्मीद है इसमें हमारे सरकारी प्राथमिक विद्यालयों से जुड़े लोग आसानी से बता पाएँगे।  हमें कल यह ज्ञान मिला। मौक़ा था एनएसएस कैम्प के दौरान एक प्राथमिक उच्च प्राथमिक विद्यालय (बीआर सी छाऊँछ) के बच्चों और अर्चना जी और गीता जी जैसी शिक्षिकाओं से मिलने का।बातचीत में पता चला कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने ख़ातिर कुछ ग़रीब मातापिता अपने अत्यंत छोटे छोटे बच्चों का नाम भी स्कूल के रजिस्टर में दर्ज करवाना चाहती हैं। कहती हैं-“ इय्यू देखो दीदी ,लरिकवा कान पकरि लेत है” उसके पीछे उनका उद्देश्य पढ़ने भेजना नहीं है।अपितु मुफ़्त में सब कुछ पाना है। अभी कल ही देखा कि सोलर लैम्प लेने के लिए एक महिला लड़ने की हद तक प्रधानाचार्य से उलझी पड़ी थी। कोई जन्मतिथि का प्रमाण न होने पर प्रधानचार्य के पास देशज तरीक़ा होता है ये उम्र नापने का पैमाना। कल बच्चों के साथ पढ़ने पढ़ाने ,खेल कूद करवाने बच्चों से बातचीत करने , और छुकछुक रेलगाड़ी के रंग...

फ़िल्म ‘गली ब्वाय’- मेरा नजरिया

जोया अख़्तर की स्क्रिप्ट पर आधारित फ़िल्म ‘गली ब्वाय’ का युवाओं में अच्छा ख़ासा क्रेज़ है। गली ब्वाय फ़िल्म एक ड्राइवर के ऐसे नौजवान लड़के मुराद की कहानी है जो स्लम बस्ती  में रहते हुए भी हिपहॉप सिंगर बनने,स्टेज पर चमकने, और अपने तबके के लोगों का   हीरो बननेका ख्वाब देखता है। यूँ तो ओ॰टी॰टी॰ के इस दौर में सिनेमा में श्लील और अश्लील का फ़र्क कम होता जा रहा है, तो  बड़े पर्दे परभी किसिंग सीन दिखाना ज़रूरी समझा जा रहा है।सेंसर बोर्ड को पिक्चर दिखवानी भी तो है। मगर कितनी कैंची और कहाँ कहाँ चलाए। एक समय था- डिस्को का। अब टाइम नया आया है रैप...

चौकीदार

चौकीदार अपने काम पर मुस्तैद। बाद बाक़ी कथा:  भगत ।परमानेंट के अतिरिक्त टेम्परेरी चौकीदार हमारे कालेज में। हम लोग खाना खाने के बाद टहल आते हैं कालेज तक।और कुछ हाल चाल कर आते हैं।  भगत रात की सभी लाइट जलाना बुझाना और घूम घाम के रखवाली करने का काम करते रहते हैं। एक बार की बात है। कैम्पस में पहली मंज़िल पर स्थित हमारे घर में क़रीब दो-ढाई मीटर धामिन (साँपकी प्रजाति)रात के क़रीब नौ बजे घुस आयी। सबके हाथ पाँव फूल गए। धामिन अपनी जान बचाए फ़्रीज़ के पीछे चिपक गई । हम लोग टॉर्च जलाए दूर से खड़े, अपनीजान बचायें।पूरा परिवार लगा हुआ,कि सरक के कहीं छिप न जाय।कोई कहे गोली मार दो कोई कहे भगाओ। क्या किया जाय, इतनी रात,समझ न आए। किसी ने बताया भगत को बुलाओ । उतनी मुश्किल में भी हमें प्रेमचंद की कहानी मंत्र का पात्र भगत याद आ गया। हमने कहा वो क्या करेगा। बहरहाल अपने भगत आ गए और डंडे से हटाते हुए बिना किसी हल्ला गुल्ला के धामिन  साँपको बाहर कर आए।यूँ लगा जैसे कोई छोटा मोटा कीड़ा मकोड़ा हो। हम सब ने चैन की साँस ली। दूसरा वाक़या फिर कभी। # सच्चीमुच्ची 01/04/2019 Lakhimpur kheri ...

लोककथाएँ- भोजपुरी और अवधी

1- भोर में पाँच बजे की शान्ति को भंग करती, वो तेज़ आवाज़ में पियु पियू पियू पियू की रट लगाए थी। योग के लिए आयी सहेलियों ने एक लोककथा सुनायी। आप भी सुनिए। ........... बहुत पहले की बात है। एक औरत थी । उसका पति कमाने के लिए परदेस चला गया था। बेचारी औरत अपना और बच्चों का किसी तरह पालन पोषण करती रही। एक दिन उसका पति लौटा| बच्चे चिल्लाए - बप्पा आए बप्पा आए। ग़ुस्से में पत्नी ने अंदर से किवाड़ बंद कर लिया। उसे अपने कष्ट याद आ गए। सोचा कि उसका पति मनुहार करेगा, उसे मनाएगा । पर ऐसा हुआ  नहीं । उल्टे, पति अपनी खड़ाऊँ और डंडा बाहर रख कर वापस चला गया। थोड़ी देर बाद जब कोई आहट नहीं मिली तो पत्नी ने केवाड़ी खोली। पति को बाहर न पाकर वह पागल हो कर बोलने लगी -पियू कहाँ ,पियू कहाँ, पियू कहाँ ? फिर क्या हुआ कि बोलते-बोलते, बोलते-बोलते, बोलते -बोलते वह औरत चिड़िया बन गयी और आज भी वह पियू पियू की रट लगाए है।  इस प्रसंग से सम्बंधित ‘चइता' है। जो पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार में गाया जाता है\ सेजिया से सइयाँ रूठि गइलें हो रामा, कोयल तोरी बोलिया। सुतले बलम के जगावे हो रामा कोयल तोरी बोलिय...

हवा और सूरज की बहस का पुनर्पाठ

18/06/2018 हवा और सूरज की बहस में दरअसल दोनों ही नहीं जीतते सूरज को बस अहंकार रहता है कि वो विजयी हुआ । उसने अपनी शर्तें रखी। अरे ये क्या बात हुई कि “चलते राही के कपड़े जो सहज उतरवा लेगा हम दोनों में वही अधिक सबसे बलवान रहेगा” राही से भी एक बार पूछना था कि नहीं? आकुल व्याकुल तप्त मन पानी की बूदों से ख़ुश हुआ. जीत हुई बरसात की, बूँदों की, रिमझिम बरसात की, मूसलाधार बरसात, जीत बौछारों की हुईं जिससे मन का कोना कोना  हुआ प्रफुल्लित

पुस्तक समीक्षा- बेबिलोन का सबसे अमीर आदमी

जिस तरह कभी खेती किसानी के लिए घाघ की कहावतों को मौसम के पूर्वानुमान के तौर पर फ़ॉलो किया जाता था। उसी तरह यदि आप   अमीर  बनना चाहते हैं तो उसके   लिए पढ़िए  ‘ बेबिलोन का सबसे अमीर आदमी ’ किताब को   । और सिर्फ़ पढ़िए ही नहीं गुनिए भी।यानि उसमें  बताए नुस्ख़ों का अनुपालन किजिये।   किंतु पढ़ने से पूर्व यदि आप इस किताब के बारे में जानना चाहते हैं तो मेरा यह लेख पढ़िए। गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह ही धन के नियम भी अपरिवर्तनीय और शाश्वत हैं। भविष्य रूपी सड़क पर अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए जो सबसे ज़रूरी चीज है वो है पैसा। हालाँकि पैसा सब कुछ नहीं पर रोटी कपड़ा मकान की आपाधापी में बहुत कुछ अवश्य है। तो हम कह सकते हैं कि मानव जीवन   का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बन गया है पर्स को मोटा करते जाना। पर्स हमेशा पैसों से कैसे भरा रहेगा इसके लिए पूँजी जुटाना और उसका समझदारी से निवेश अत्यंत आवश्य...