आते जाते ख़ूबसूरत आवारा सड़कों पे
1- बनारस से लखीमपुर के बीच का सफ़र करते हुए पचीस साल से अधिक हो गया । अक्सर ठीक ठीक तय नहीं कर पाते हैं कि कौन दिल के अधिक क़रीब है । लखीमपुर पहुँचते ही कुछ अपना सा लगता है और बनारस पहुँचते ही फिर से वही अपनापन। बात मई 2018 की है।बनारस से वापस आ रहे थे।हमारा कुछ काम लखनऊ HDFC इन्श्योरेंस आफिस में था। हम सेंट फ़्रांसिस से मुड़कर हलवासिया पहुँचे । एक प्राइवेट पार्किंग में गाड़ी खड़ी की , लेकिन वहाँ काम कर रहे लड़के जो नशेड़ी और मनबढ़ लगे, बोले गाड़ी की चाबी हमें दे दीजिए। हम लोगों ने कहा क्यों दे दूँ ? बहुत क़ीमती न भी हो तो भी हमारे कई सामान इसमें हैं। तुम लोगों पर इतना यक़ीन नहीं कर सकते। नतीजा उन सबने पार्किंग में जगह देने से मना कर दिया। उनकी बातचीत का ढंग भी ख़राब था। थोड़ी खीझ और ग़ुस्से से हम लोग बाहर आए। वहाँ रहने वालों ने अपने घर के बाहर गार्ड रखे थे जो मना किए यहाँ गाड़ी खड़ी न कीजिए। अब हमने इत्मिनान से शीशा उतारा और एक नौजवान से दिखते गार्ड से बताया अपनी परेशानी । बातों को सुनते -सुनते गार्ड बड़े अपनेपन से बोला । दिमाग़ ख़राब है क्या उन लोगों का। चलें बतायें...