गौसेवा के नाम पर पलते NGO

कोई  गाय बचाएगा
कोइ बछड़ा 
और वो बचाएँगेपगहा’ 

ये हाल है एक गौमाता की सेवा का ढोंग दिखाने वाले एक NGO का।
घटना है कल यानि २८ अप्रैल की।

सुबह से ही गाय ‘बेचारीदिख रही थी। धीरे धीरे चल रही है कभी इधर कभी उधर शाम तक  गाय एक बच्चे को बियाई  उसके मालिक का कोई अता पता नहीं
मुझे याद है हमारे गाँव में गाभिन गाय या भैंस की देखभाल गर्भवती बहुओं से कम नहीं होती थी। और बच्चा देने के बाद शुरू में भी बहुत देखभाल की जाती थी।गुड़ पका के या और भीकई चीज़ें खिलाई जाती।
कालोनी के लोग  उसकी निगरानी करते रहे कि कुत्ते बछड़े को नोच खाए
शुरू हुआ किसको सौंपा जाय यहाँ उसके लिए नाद-चारा कुछ भी तो नहीं 
कई जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों से सम्पर्क किया गया।
पता लगा एक NGO का फ़ोन किया गया बोला उन्होंने ,अभी पहुँचे और आधा घंटे में एक पगहे के साथ हाज़िर मन में एकदम से सम्मान के विचार गये कितने अच्छे लोग हैं ऐसी संस्थाएँ हों तो कितना मुश्किल होता ।वगैरह 
बहरहाल संस्था के लोग गाय  को सहलाए, पुचकारे और पगहे से बाँध के हमारे ही कैम्पस में अमरूद के पेड़ से बाँध गए और बोले कि हमारा आदमी आएगा तो शाम तक उठवा लेंगे नहीं तो कल सुबह तक  ले जाएँगे आप लोग इसे रोटी-ओटी दे दीजिएगा। 
गाय अभी भी परेशान थी क्योंकि प्लेसेंटा अभी नहीं गिरा था थोड़ी देर में प्लेसेंटा भी गिर गया तो गाय बैठ गई।  घंटो के दर्द के बाद आराम करने लगी। 
कालोनी के परिवार से सभी लोग उसे  कुछ खाना पानी खिलाये। वैसे तो कालोनी में कुत्ता ख़रगोश मुर्ग़ा तोता सभी पले हैं । और लेकिन यहाँ समस्या ये कि किसी को गाय पालने का न तो पर्याप्त अनुभव   ही संसाधन। 
बहरहाल एक गाय पालने वाला परिवार परिचित था उनको बुलाया गाय  उसके साथ जाने को तैयार नहीं। बछड़ा उठाओ तो मारने को दौड़तीं। बड़ी मशक़्क़त से एक ऑटो बुला के उसमें बछड़े को लेके एक आदमीं बैठा और फिर पीछे पीछे गाय उसके घर गई।
हम सभी ने गाय को सही ठिकाने  पर पहुँचा के राहत की साँस ली। 
इस बीच NGO के मालिक का फोन आया कि आसपास की गंदगी किसी से साफ़ करवा दीजिए . और जैसे ही उसका मालिक आए हमें फ़ोन करिएगा। सुबह फिर  वो आया और पूछा -गाय कोई ले गया ?
-हमने बोला ,हाँ
-और  पगहा?
-हमने तल्खी से कहा गौरक्षा के नाम पर १०० रुपये का पग़हा तो सब्र ही कर लो।

लावारिस गायों से जुडे ऐसे अनुभव होते रहते हैं अपनी कालोनी में। 


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