आर्टिकल 15 फ़िल्म समीक्षा
आर्टिकल 15 का सच
“कहब त लग्ग जाई धक्क से , धक्क से “
पर कहना है।
हफ़्ते भर के इंतज़ार के बाद अंततः फ़िल्म देख ही लिया। दिन में 1:45 बजे एकमात्र शो चलना था और उसमें भी बमुश्किल पचास दर्शक रहे होंगे।
“कहब त लग्ग जाई धक्क से , धक्क से “
पर कहना है।
हफ़्ते भर के इंतज़ार के बाद अंततः फ़िल्म देख ही लिया। दिन में 1:45 बजे एकमात्र शो चलना था और उसमें भी बमुश्किल पचास दर्शक रहे होंगे।
मेरा फ़ेस्बुक इस फ़िल्म की एक से बढ़कर एक समीक्षा से भरा हुआ था। ऑनलाइन बुकिंग की कोशिश में लगता था , फ़िल्म हाउसफ़ुल चल रही होगी। किंतु वास्तविकता कुछ और थी। असल में दर्शक न मिल पाने की वजह से फ़िल्म स्क्रीन पर दिखायी ही नहीं जा रही थी।
ये हाल है हमारे शहर का।
ये हाल है हमारे शहर का।
समाज की अनेक विद्रूपताओं को दिखाती ये फ़िल्म मन में कई तरह की कुलबुलाहट पैदा करती है।हालाँकि कोई भी सीन ऐसा नहीं है जिससे हम अनभिज्ञ हों। किंतु समाज की अनेक बदसूरत व्यवस्थाओं , ख़ासकर वर्ण व्यवस्था पर चोट करती है। एक भी ऐसा क्षण नहीं जबकि आपको उबन महसूस हो।
इतना कहूँगी कि गौरव सोलंकी और अनुभव सिन्हा ने फ़िल्म बनाकर हिम्मत का काम किया है। ग़नीमत है किसी तबके से अभी तक इसके विरोध में प्रदर्शन नहीं शुरू हुआ है। फ़िल्म का फ़िल्मांकन और साउंड बेहद दिलकश है।
गौरा के रोल में सयानी गुप्ता और ब्रह्मदत्त सिंह के रोल में ‘इनफ़ैक्ट’ मनोज पाहवा बहुत प्रभावी है।
बस इतना कहना है -मौक़ा लगा के एक बार बड़े परदे पर फ़िल्म देख आइए।
11/07/2019
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