वो लड़की

वो डबडबायी आँखें । नक़ाब से लिपटा बदन और हिजाब से झाँकती सुंदर सलोनीसूरत।
एक हाथ में बैग, दूसरे में काग़ज़ात के फ़ोल्डर।
अचानक आ पहुँची अधिकारी के ऑफ़िस में।कुछ कहती उससे पहले ही आँखों में अटके आँसू झरने लगे। और फिर फूट के रोना। मन में ये तस्वीर उतर गई। और थोड़ी बेचैनी भी।
आँसुओं की वजह कुछ कुछ ताड़ ही लिया ।
थोड़ी देर सुबकने के बाद अपने आँसुओं और दर्द को रोकते हुए उसके मिसरी से बोल फूटे-
“आप तो प्रिन्सिपल हो ।मेरा ऐडमिशन कर सकते हैं”
कलेजा चिर गया । काश क़लम में मेरे ताक़त होती! मैं कह देती जाओ हो जाएगा तुम्हारा।
लेकिन ऐसा हो न सका।
सुबकते हुए ही उसने बताया की अपने घर वालों से कितना लड़ झगड़ कर उन्हें इस बात के लिए तैयार किया था कि एम॰ए॰ का फ़ार्म हमें डालने दीजिए।और अब बताया जा रहा है कि तुम्हारा प्रवेश यहाँ नहीं हो सकता क्योंकि एक साल का गैप हो गया है।
मैं चुपचाप सुनती रही उसे और देखती रही आँसुओं की झड़ी।
सिर्फ़ दिलासा दे पायी-
“ज़िंदगी ने शायद तुम्हें किसी और बड़े काम के लिए बचा रखा है,एक दरवाज़ा बंद हुआ है ,ग़ौर करो ,दूसरे रास्ते खुले होंगे तुम्हारे लिए।”
धीमें क़दमों से उसे जाते मैं देखती रह गई।
या मौला मुझे अलादीन का चिराग़ ला दे।उस बच्ची की झोली में ज़िंदगी के उजाले डाल दूँ।
—-नूतन

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