बनारस देखिये आहिस्ते आहिस्ते
बनारस की सुबह दशाश्वमेध सड़क पर ये दृश्य आम हैं।महिलायें गंडसा ले के छः इच तक के दतुअन काटती रहती हैं, बेचती रहती हैं,ढेरी लगाए रहती हैं कुछ दतुअन की साइज़ इतनी मोटी होती है की गलफड ही छील देते होंगे।पर सब बिकता है यहाँ।
31/05/2019
आजकल गरमियों में हाल-ए-सुबह बनारस।
कभी होती रही होगी यहाँ की सुबह घड़ी घंटों घड़ियालों,शंख और मंत्रोच्चार की ध्वनियों से।
धर्म और कर्मकांड की नगरी बनारस में आजकल अन्य पारम्परिक बातों के साथ घाटों के आसपास की सुबह कुछ अलग भी है।
बच्चे अपने मम्मी पापा के साथ तैरने की कला सीख रहे होते हैं।इसमें पाँच साल से लेकर बड़े बच्चे सभी शामिल हैं, जिसको जब जुनून आ जाय। बच्चों के मातापिता घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सूर्योदय के पल पल बदलते दृश्यों को आँखों में या कैमरे में क़ैद करते हैं और बच्चे छपकछांय तैराकी की कला सीखने में लगे रहते हैं।
धरम करम,पंडा पुजारी, चंदन टीका, फूलमाला दीया बाती ये सब अलग चलता है।
धर्म और कर्मकांड की नगरी बनारस में आजकल अन्य पारम्परिक बातों के साथ घाटों के आसपास की सुबह कुछ अलग भी है।
बच्चे अपने मम्मी पापा के साथ तैरने की कला सीख रहे होते हैं।इसमें पाँच साल से लेकर बड़े बच्चे सभी शामिल हैं, जिसको जब जुनून आ जाय। बच्चों के मातापिता घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सूर्योदय के पल पल बदलते दृश्यों को आँखों में या कैमरे में क़ैद करते हैं और बच्चे छपकछांय तैराकी की कला सीखने में लगे रहते हैं।
धरम करम,पंडा पुजारी, चंदन टीका, फूलमाला दीया बाती ये सब अलग चलता है।
विदेशी सयलानी यहाँ ख़ूब दिखते हैं। मल्लाह बोटिग कराने की मनुहार करते मिलेंगे। नीम की दातुअन बेचती महिलायें दिखेंगी। चायवाले फेरीलगाकर चाय बेचते और ऊँघते कुत्ते व भीखमगते अपनी अपनी हरकतों के साथ दिखते रहेंगे।
गंदगी का आलम बहुत अधिक नहीं तो कम भी नहीं कहा जा सकता। यदि आँखे फैलाकर देख लिया तो श्रद्धा का भाव निश्चित कम हो जाता है और गंगा में नहा नहीं सकते। इधर के घाटों पर भीड़भाड़ से बचना है तो लोग नाव से उस पार जाकर रेती की तरफ़ नहाते हैं। उधर रेती की तरफ़ भी दो तीन चाय की दुकानें हैं।
गंदगी का आलम बहुत अधिक नहीं तो कम भी नहीं कहा जा सकता। यदि आँखे फैलाकर देख लिया तो श्रद्धा का भाव निश्चित कम हो जाता है और गंगा में नहा नहीं सकते। इधर के घाटों पर भीड़भाड़ से बचना है तो लोग नाव से उस पार जाकर रेती की तरफ़ नहाते हैं। उधर रेती की तरफ़ भी दो तीन चाय की दुकानें हैं।
हालाँकि गंगा मइया हमारे मल्लाहों की रोज़ी का महत्वपूर्ण साधन अवश्य हैं।
दो चार सफ़ाई कर्मी अपने काम में लगे रहते हैं। कुछ स्वयंसेवक कभी कभी सफ़ाई अभियान चलाते हैं। गंगा की सफ़ाई का बजट क्या है नहीं मालूम पर सफ़ाई व्यवस्था दिव्य कुम्भ जैसी नहीं ।
एक ख़ास बात इस बार बनारस की सुबह में हमें थूकने वाला शहर दिखा, या तो पान खा के या नीम की दतुअन कर के।
दो चार सफ़ाई कर्मी अपने काम में लगे रहते हैं। कुछ स्वयंसेवक कभी कभी सफ़ाई अभियान चलाते हैं। गंगा की सफ़ाई का बजट क्या है नहीं मालूम पर सफ़ाई व्यवस्था दिव्य कुम्भ जैसी नहीं ।
एक ख़ास बात इस बार बनारस की सुबह में हमें थूकने वाला शहर दिखा, या तो पान खा के या नीम की दतुअन कर के।
सबसे सुंदर दृश्य सीढ़ियों पर बैठकर नीबू चाय की चूस्कियों के साथ कल कल करती गंगा किनारे सूर्योदय देखना और गुनगुनाना “गंगा बहती है क्यूँ”ही है।
01/06/2019
होटल ब्रिजरमा के अंदर जाना बहुत महँगा सौदा है पर बाहर से फ़ोटो लेने से कोई मना नहीं कर सकता। राजा दरभंगा का बनवाया पैलेस ।अब ब्रिज़रमा होटल है। होटल से डायरेक्ट लिफ़्ट से सीधे घाट पर पहुँचना। होटल का रिवर व्यू गंगा नदी से।


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