हँस्गुल्ले

१-
बाऊजी की डिग्री सर्टिफ़िकेट
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डिग्रियों को लेकर मची खींचा तानी में हमें इन्स्पेक्टर चाचा याद आते हैं।श्री लोकनाथसिंह।
वो एल॰आई॰सी॰ में काम करते थे ।किस पद पर थे ये भी नहीं मालूम। लेकिन सब लोग उन्हें इंस्पेक्टर साहब ही कहते थे।
1978-79 में जब हम सातवीं जमात में पढ़ते थे। बहुत कम लोगों के पास बाइक होती थी,तब वे बुलेट से चलते थे । दग़दग़ दग़ दग़ करती बुलेट की आवाज़ और उस पर बैठे चाचा। दूर से ही हो जाती थी उनके आने की ख़बर। जब बुलेट पुरानी हो गई किसी ने कहा बेच क्यों नहीं देते। भोजपुरी कहावत में बोलते -“खुरपी के का बेचले का बंधक धइले” मतलब बेचने पर कितना मिलेगा ही जो बेच दें।पड़ी रहने देते हैं।
वैसे उससे उनका लगाव गहरा रहा होगा। कहावत तो अपने मज़ाक़िया स्वभाव की वजह से कही होगी।
चंदौली में हम लोग पापा के तबादले के बाद पहुँचे थे। पता चला वो गाँव के हमारे क़रीबी हैं, एक ही पूर्वज की संतान।हम लोगों की पारिवारिक नज़दीकी हो गई यहाँ।कई मज़ेदार बात बताते थे चाचा। उसी में से एक क़िस्सा डिग्रियों का है।
हाँ तो डिग्री वाली बात यूँ है कि एक बार चाचा के घर में मेहमान आए थे। उनके छोटे बच्चे ने ज़मीन पर टट्टी कर दी । बच्चे की माँ उसे साफ़ करने के लिए इधर उधर देखने लगी । उसे एक मोटा काग़ज़ दिखा । उसे फाड़ कर उससे गंदगी साफ़ करने ही जा रही थी कि किसी की नज़र पड़ी । बोला अरे अरेरेरेरे! “ई त बाऊजी क डिग्री हव’” और इस तरह सर्टिफ़िकेट जाते जाते बच गई।
हो सकता है ऐसे ही नेताओं / नेत्रियों की बड़ी डिग्रियाँ गुम हो गई हों।

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