बिन पानी सब सून, घरथरी के बहाने, पर्यावरणीय चिंताएं


  "घरथरी" 
क्या यह शब्द कभी सुना है आपने?जो लोग पहले के होंगें और गाँव के कच्चे घरों में रहे होंगे,वो शायद जानते हों।कहीं कहीं इसे ‘’घिरौंची’’ भी कहते  थे।
पहले कुएं ही पानी के साधन थे,जिससे पानी काढ़कर घरों में(कुंडा, ठील्ला और गगरी में)भरा जाता था। किसी के यहां दो कुंडा, किसी के यहां एक कुंडा और एक ठिल्ला और किसी के यहां सिर्फ एक ही कुंडा। 

(परानी यानि प्राणी)सदस्यों मतलब औरतों की संख्या के हिसाब से पानी भरा जाता था क्योंकि पुरुष तो बाहर ही नहाते थे। 
पानी भरने का काम कहार करते थे और दोनों टाइम पानी भरते थे।कुएं भी दो प्रकार के होते थे ,एक घिरनी वाले जिससे पानी खींचा जाता था और इसमें थोड़ी आसानी रहती थी लेकिन इस प्रकार के कुओं की संख्या कम थी ।ज्यादातर (लिलारी) मतलब सील,कुएं के एक किनारे लकड़ी का मोटा बीम रखा रहता कहीं-कहीं पत्थर का भी रहता था जिसके सहारे पानी काढ़ा जाता था। अरे वही"रसरी आवत जात ते सिल पर होत निशान"

धीरे-धीरे हैण्ड पंप जिसे कुछ लोग चांपाकल कहते थे,उस का जमाना आया लेकिन सबकी सामर्थ्य नहीं थी कि लगवा पाए इसलिए कहीं-कहीं किसी के दुवारे (दरवाज़े )पर हैंडपाईप लगी इससे बहुत फर्क नहीं पड़ा हाँ पानी भरने वालों को थोड़ा आसानी हो गयी अब सिर्फ हैंडिल चलाओ पानी भरो।हमारे होश में मुश्किल से शायद 5-6घरों के अंदर हैडपाईप लगी थी ,बाकी लोग के यहां या तो नहीं लगी थी या बाहर लगी थी जिससे पानी ढोने की परेशानी थी ही।इस समय की तो बात ही कुछ और है कि एक बाल्टी पानी लेने के लिए 20 बाल्टी पानी गिराया जा रहा है क्योंकि सिर्फ बटन ही तो दबानी है। 
         यह सब बात मैं इसलिए कर रहा हूँ कि इस साल हमारे गाँव के सभी लोगों के पम्पिंगसेट(पुराने वाले)पानी छोड़ दिये हैं क्योंकि वाटर लेवल नीचे चला गया और इस साल अभी तक अच्छी बारिश भी नहीं हुई।सिर्फ सबमर्सिबल चल रहे हैं इसलिए धान की रोपनी कम हो पाई है।हम भी नई बोरिंग करा रहे हैं।मैं समझता हूं इस बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप सब जानतें हैं वाटर लेवल के बारे में।मैं सिर्फ ये कहना चाह रहा हूँ कि क्या होने वाला है भविष्य में?खेती की तो बात अलग है,आज की स्थिति देखकर लग रहा है कि पीने को पानी नहीं मिलेगा यदि यही स्थिति रही तो।स्थिति मतलब दोहन ज्यादा और बारिश कम। मैं यही कहना चाह रहा हूँ कि पहले पानी का प्रचुर भंडार था लेकिन पानी कम यूज होता था क्योंकि संसाधन कम थे आज यही संसाधन ही वो कारण है जिससे अपरंपार दोहन किया जा रहा है और इससे भी महत्वपूर्ण ये कि दुरुपयोग किया जा रहा है।जरा सोचिये कैसे एक या दो कुंडा पानी में औरतें घर का सारा काम निबटा देती थीं जिसमें नहाना भी शामिल था।किसी के घर से निकलने वाली नाली(पनारा या नाबदान)में बस घर से थोड़ी ही दूर तक पानी बहता था क्योंकि पानी गिरता ही कम था।क्या कहें कितना कहें कहने को बहुत है ,पर बस यही कहना है हमारा कि अब से भी चेत जाओ भाई अभी भी बहुत नहीं बिगड़ा है। पानी का दुरुपयोग एकदम बन्द कर दीजिए यही अपने हित में है,समाजहित और देशहित में भी है। 
         हाँ तो घरथरी की बात तो मैं भूल ही गया।चूंकि पहले घर कच्चे होते थे इसलिए इस पानी भरे कुंडे को रखने के लिए एक पक्का फाउंडेशन हर घर में बना होता था उसमें थोड़े गड्ढे होते थे जिससे कुंडा गिरने पाए।अब गांव में सिर्फ एक लोग प्रमोद सिंह(विधायक) के घर में ये घरथरी अभी भी महफूज है। हालांकि अब उसका कोई यूज नहीं है बस पड़ा है ऐसे ही। उसमें जो गड्ढे थे उसे सीमेंट से भर दिया गया है जो बर्तन धोने के बाद रखने के काम रहा है। 
अन्त में यही कहना है कि "जल है तो कल है" इस बात को शिद्दत से समझें।

Article written by
-Upendra singh

pic credit to Upendra

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