हमारा पहला सिनेमा
संस्मरण
पहले सिर्फ़ बाइस्कोप देखा था और उसी को सिनेमा समझते थे। फ़िल्मी गीत गाने ज़रूर रेडियो पर सुन रखे थे।
पहली बार सिनेमाहाल में जाकर सन् 1972 -73 में पहला सिनेमा देखा ,उत्तरप्रदेश के शहर मिर्ज़ापुर में। उम्र रही होगी चार- पाँच साल। दिन था दीपावली का।
उस समय नया नया सिनेमाहाल बना था। नाम था-'तुलसी चित्र मंदिर। घर से ज्यादा दूर नहीं था। पापा की हिदायत थी की बच्चे धार्मिक ही सिनेमा देखेंगे ।तब यातायात के इतने साधन थे नहीं। जाने के लिए हम सब तैयार। लेकिन कोई वाहन मिल ही नहीं रहा था ,जिससे झटपट पहुँचा जा सके ।
सामने ही कुम्हारों का परिवार रहता था। दो भाई थे ।एक का नाम था सठल्लू, दूसरे का मठल्लू। वे दिया,कुल्हड़, मिट्टी के खिलौने , बर्तन इत्यादि बनाते थे। कभी कभी हम बच्चों की फ़रमाइश पर हमारी मनपसंद साइज़ की गुल्लक भी बना देते । उनकी घंटों घूमती चाक और उस पर बनते मिट्टी के बर्तन हम देखते रहते। उनके पास एक ठेला गाड़ी थी। जिस पर लाद कर वे अपने बर्तन बेचने जाते थे ।हम लोगों की परेशानी देख वे झटपट अपना ठेला ले आए । बस क्या था -छोटे बच्चे ठेले पर और बड़े लोग साथ में पैदल तेज़ी से बढ़ चले।
वो पहली देखी फिल्म थी-‘अखंड रामायण’। बाद में हम लोगों ने उसी टाकीज में जाके व्वो बड़े से पर्दे पर देखा- ’हरि दर्शन‘ ,’भक्त प्रह्लाद‘ । पूरा सिनेमा देखा कि बीच में ही सो गए याद नहीं ।
लेकिन सबसे बड़ी थी वो ख़ुशी कि आज हम सिनेमा देखने जाएँगे। बग़ल वाली चाची से बता आए कि हम लोग सिनेमा देखने जाएँगे। सुन के वो भी ख़ुश । सठल्लू के घर भी बता आए थे ये ख़ुशख़बरी। वो अब भी जेहन में है।
इन तीनों फिल्मों में से अगर कुछ याद है, तो वो है- नारद का चरित्र। जो बहुत दिनों तक मन में बना रहा ।साथ में डाय्लाग भी -नारायण नारायण।
हमने गूगल पर सर्च किया ' तुलसी चित्र मंदिर, ढूँढने पर भी नहीं मिल रहा।
कहाँ गया?
नूतन सिंह
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