यू पी बोर्ड इम्तिहान
किसी ज़माने में यूपी में हाई स्कूल का इम्तिहान मतलब शहर परेशान . . हर दूसरे घर में किसी न किसी का बोर्ड इम्तिहान.
तो हमारा भी था बोर्ड इम्तिहान.चंदौली में . जो हमारे समय में बनारस जिले की तहसील हुआ करता था . बाद में जनपद मुख्यालय बन गया.
जैसे माएँ बच्चों को गब्बर का नाम ले के सुलाती थीं, उसी तरह हमारी टीचर ‘महेंद्रा’सेंटर का नाम ले के हम लोगों को डराती थीं.
“ जाना महेंद्रा , तुम लोग, गर्दन हिलाने को नहीं मिलेगा”
ठीक है भाई .गए महेंद्रा . हिंदी का पहला पेपर सुबह दे आए . और चूँकि रात भर जाग के पढ़े थे तो आ के सो गए . ढाई बजे थे कि हमारे घर स्कूल की दो टीचर ललिता बहनजी और सिंह बहनजी पहुँची. अरे सो रही हो? वहाँ संगीत का पेपर है. हड़बड़ाए से किसी की साइकिल पर बैठा के भिजवाया गया. रोते गाते , बदहवास सी कुल १५ लड़कियाँ . सबको किसी न किसी तरह बुलवाया गया. टेलिफ़ोन का ज़माना तो था नहीं और न ही गाड़ी मोटर की सुलभता.
स्कीम देखने में कुछ ग़लतफ़हमी हुई थी. हम लोगों के हिसाब से बाद में पेपर था किसी तरह सेंटर पहुँचे सब लोग. जैसे तैसे पेपर दिया गया. किताब , पर्ची से तब भी नक़ल नहीं करने दिया गया. हाँ ,थोड़ी रियायत बरती गयी. अगल बग़ल से थोड़ी-बहुत पूछताछ हुई. सभी की दशा एक जैसी थी, क्योंकि आसान पेपर पढ़ लेंगे सोच के सबने कुछ दिन पहले से विषय रिवाइज नहीं किया था. संगीत गायन का पेपर ज़्यादा बड़ा नहीं होता था .तीन घन्टे का पेपर लगभग दो घन्टे मे पूरा. रेजल्ट आया तो संगीत में डिस्टिंक्शन था. किसी भी क्लास का हमारा एकमात्र डिस्टिंक्शन. कुल अंक मिलाकर फ़र्स्ट डिविज़न रहा.
तो हमारा भी था बोर्ड इम्तिहान.चंदौली में . जो हमारे समय में बनारस जिले की तहसील हुआ करता था . बाद में जनपद मुख्यालय बन गया.
जैसे माएँ बच्चों को गब्बर का नाम ले के सुलाती थीं, उसी तरह हमारी टीचर ‘महेंद्रा’सेंटर का नाम ले के हम लोगों को डराती थीं.
“ जाना महेंद्रा , तुम लोग, गर्दन हिलाने को नहीं मिलेगा”
ठीक है भाई .गए महेंद्रा . हिंदी का पहला पेपर सुबह दे आए . और चूँकि रात भर जाग के पढ़े थे तो आ के सो गए . ढाई बजे थे कि हमारे घर स्कूल की दो टीचर ललिता बहनजी और सिंह बहनजी पहुँची. अरे सो रही हो? वहाँ संगीत का पेपर है. हड़बड़ाए से किसी की साइकिल पर बैठा के भिजवाया गया. रोते गाते , बदहवास सी कुल १५ लड़कियाँ . सबको किसी न किसी तरह बुलवाया गया. टेलिफ़ोन का ज़माना तो था नहीं और न ही गाड़ी मोटर की सुलभता.
स्कीम देखने में कुछ ग़लतफ़हमी हुई थी. हम लोगों के हिसाब से बाद में पेपर था किसी तरह सेंटर पहुँचे सब लोग. जैसे तैसे पेपर दिया गया. किताब , पर्ची से तब भी नक़ल नहीं करने दिया गया. हाँ ,थोड़ी रियायत बरती गयी. अगल बग़ल से थोड़ी-बहुत पूछताछ हुई. सभी की दशा एक जैसी थी, क्योंकि आसान पेपर पढ़ लेंगे सोच के सबने कुछ दिन पहले से विषय रिवाइज नहीं किया था. संगीत गायन का पेपर ज़्यादा बड़ा नहीं होता था .तीन घन्टे का पेपर लगभग दो घन्टे मे पूरा. रेजल्ट आया तो संगीत में डिस्टिंक्शन था. किसी भी क्लास का हमारा एकमात्र डिस्टिंक्शन. कुल अंक मिलाकर फ़र्स्ट डिविज़न रहा.
एक समय था जब हमसे पहले की पीढ़ी के लोग कहते थे ‘गुड सेकेंड क्लास’ में दसवीं या बारहवीं पास हैं. हम लोग सुन के मुस्कुरा देते. “गुड सेकेंड”.फ़र्स्ट डिविज़न और डिस्टिंक्शन की बात पर तो मेधावी की श्रेणी में आ जाते.
अब पचहत्तर प्रतिशत अंकों से इंटर पास होने के बाद भी बच्चे ग्रैजूएशन में लटक जा रहे . एम॰ए किए स्टूडेंट्स को छठीं कक्षा के बराबर की जानकारी नहीं.
अब पचहत्तर प्रतिशत अंकों से इंटर पास होने के बाद भी बच्चे ग्रैजूएशन में लटक जा रहे . एम॰ए किए स्टूडेंट्स को छठीं कक्षा के बराबर की जानकारी नहीं.
इस बार ख़बर आइ कई हज़ार परीक्षार्थियों ने बोर्ड की परीक्षा छोड़ी. आख़िर क्यों छोड़ी . ये महत्वपूर्ण प्रश्न है.जिन्होंने छोड़ी वे पास हो कर ही कौन सा तीर मार लेते. और जो नक़ल मार के पास हैं वे ही क्या कर लेंगे.
हर बार प्रशासन जुट जाता है नक़ल विहीन परीक्षा करवाने के लिए. जबकि कहीं कहीं पहुँच का लाभ उठाकर नक़ल के ठेके भी लिए ही जाते हैं. ये नक़ल कब से शुरू हुई और कब विकराल हो गई . क्या प्रशासन को पता ही नहीं चला. जब से काग़ज़ी प्रमाण पत्र ज़रूरी हो गए.जॉब ओरीएंटेड शिक्षा हो गई. तब से पढ़ाई की हालत तो बहुत नहीं सुधरी . पर अदम गोंडवी के शब्दों में ‘फ़ाइलों में मौसम गुलाबी ‘ हो गया. आँकड़ों में लाखों पढ़ रहे हैं और पास हो रहे हैं. पर सच कहा जाय तो शिक्षा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं, जड़ से ले के पुनुई तक. गिरावट जारी है . कुछ अपवाद को छोड़ दिया जाय तो.
पढ़ाई से लेकर इम्तिहान और पेपर सेट्टिंग से लेकर कॉपी जाँचने और रिज़ल्ट आने तक शुचिता का दंभ भरने वाले परीक्षा नियंत्रक केवल नाम के लिए हवन कर रहे हैं. सही समय पर रिज़ल्ट दे पाने के दबाव के कारण तरह तरह के प्रयोग चलते रहते हैं. शिक्षक है ही नहीं तो कॉपी जँचेगा कौन.
तरीक़ा है न. वस्तुनिष्ठ प्रश्न और कम्प्यूटरजी.
बच्चे की विश्लेषण करने की क्षमता ख़त्म कर दी जा रही है.
कभी शिक्षा पुण्य का काम था,जबकि अब उभरता हुआ व्यवसाय.
अल्लाह जाने क्या होगा आगे.
हर बार प्रशासन जुट जाता है नक़ल विहीन परीक्षा करवाने के लिए. जबकि कहीं कहीं पहुँच का लाभ उठाकर नक़ल के ठेके भी लिए ही जाते हैं. ये नक़ल कब से शुरू हुई और कब विकराल हो गई . क्या प्रशासन को पता ही नहीं चला. जब से काग़ज़ी प्रमाण पत्र ज़रूरी हो गए.जॉब ओरीएंटेड शिक्षा हो गई. तब से पढ़ाई की हालत तो बहुत नहीं सुधरी . पर अदम गोंडवी के शब्दों में ‘फ़ाइलों में मौसम गुलाबी ‘ हो गया. आँकड़ों में लाखों पढ़ रहे हैं और पास हो रहे हैं. पर सच कहा जाय तो शिक्षा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं, जड़ से ले के पुनुई तक. गिरावट जारी है . कुछ अपवाद को छोड़ दिया जाय तो.
पढ़ाई से लेकर इम्तिहान और पेपर सेट्टिंग से लेकर कॉपी जाँचने और रिज़ल्ट आने तक शुचिता का दंभ भरने वाले परीक्षा नियंत्रक केवल नाम के लिए हवन कर रहे हैं. सही समय पर रिज़ल्ट दे पाने के दबाव के कारण तरह तरह के प्रयोग चलते रहते हैं. शिक्षक है ही नहीं तो कॉपी जँचेगा कौन.
तरीक़ा है न. वस्तुनिष्ठ प्रश्न और कम्प्यूटरजी.
बच्चे की विश्लेषण करने की क्षमता ख़त्म कर दी जा रही है.
कभी शिक्षा पुण्य का काम था,जबकि अब उभरता हुआ व्यवसाय.
अल्लाह जाने क्या होगा आगे.
Nicely written ,its reality
ReplyDeleteNicely written ,its reality
ReplyDelete