लोकपर्व छठ

-अनारकली ऑफ़ आरा,
-आरा हिले छपरा हीले....
-तू लगावेलू जब लिप्स्टिक
हीलेला आरा डिस्टिक...
जैसी बातों से हमारा नाता मात्र मूवी या गाने से नहीं जुड़ता बल्कि एक ख़ास वजह है हमारे जुड़ाव की , वो है- हमारे ननिहाल का ज़िला ‘आरा’ होना.
जहाँ मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बार गई हूँ, बचपन में. बस, ट्रेन और इक्के की सवारी करते हुए. लगभग एक महीने के लिए .मौक़ा था-
लोकपर्व छठ का.
नानी की मानी गई मनौती पूरी होने पर अम्मा को यह पूजा एक बार करनी थी.
नानी से हमारी मुलाक़ात होने के पहले ही वो तारा बन चुकी थीं। नानी के घर बड़े से आँगन में बँटवारे के बाद आठ दस परिवार रहते थे, शाम को ढ़ीबरी,लालटेन, चूल्हे की जलती लौ की रोशनी में हर रोज़ दिवाली जैसी लगती,जब सभी परिवार अपना अपना खाना बना रहे होते।घर के मर्द ज़्यादातर दालान या बैठक में ही होते.
छठ का पर्व आने वाला है जिसकी तैयारी ज़ोर शोर से चल रही है। पूरे गाँव की ख़ूब साफ़ सफ़ाई, एकदम चकाचक किया जा रहा है,हर काम में साफ़ सफ़ाई का विशेष ध्यान, किसके घर गेहूँ धुल गया, किसके घर आटा पिस गया.....
शाम को आँगन में छठ गीत दिवाली के पहले से ही शुरू हो जाते, ढेर सारी मामी, मौसी ,नानी, सब मिलके गा रही है. कोई चौके में खाना बनाते हुए कोई आँगन में नल से पानी भरते हुए राग में राग मिला रहा है, मैं लगभग दस साल की थी कुछ गीत सुनते सुनते मैं भी साथ साथ गा लेती थी,
“केलवा जे फ़रेला घवद से ओपे सुग्गा मडराय”
“काँच ही बाँस के बहँगिया बहँगी लचकत जाय”
“साँझ भईल छठी रहलू तू कहवा”....
थोड़ी देर बाद हाल चाल शुरू होती ,
फ़लाँ कल टाटा से आ रहे,
बोकारो, भिलाई, कलकत्ते, सेआने वाले लोग पहुँच चुके है....नौकरी पर से छुट्टी ले के लोग आ रहे हैं, छठ पूजा के लिए.
पूजा के लिए नई साड़ी,चूड़ीबिंदी,कई तरह के फल, सुपेली,सबकी ख़रीदारी करने संदेश बाज़ार या आरा तक गाँव के लोग जाते थे, चढ़ाने के लिए ठोकवा बन रहा है.और ढेरों तैयारियाँ.जो व्रत नहीं कर रहे वे व्रतियों का सहयोग कर रहे होते. व्रतियों का सहयोग करना भी पुण्य का काम माना जाता था.
हालाँकि सोन नदी पास ही बहती थी ,पर उस समय आजकल की तरह साधन न होने से गाँव में ही टेम्प्रेरी तालाब बनाकर वहीं खड़े होकर पूजा होती।पहले डूबते सूरज की फिर दूसरे दिन उगते सूरज की,
यद्यपि मान्यता है कि बेटों के लिए यह पर्व है पर अर्घ्य देते देते व्रती सूर्यदेवता से अपने पूरे परिवार की ख़ुशहाली की कामना न करते हों ऐसा नहीं हो सकता,
इतने क़रीब से छठ न देखा होता तो उस पर्व के मर्म को हम ना ही समझ पाते।सोशल मीडिया पर छठ की चहल पहल देख यादें ताज़ा हो गई।
PS -आस्था का सैलाब दिनोंदिन ऐसा बढ़ता जा रहा है कि कुछ दिन बाद प्रशासन की अनुमति लेनी पड़ सकती है के कौन घर में अर्घ्य देगा और कौन घाट पे जा के।
प्रकृति पूजा के इस दिव्यपर्व पर सभी को मंगलकामनाएँ

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