‘अंगार डिबिया
शहरों में जिसके घर में पूजा पाठ न होता हो उसके घर माचिस की डिबिया मिलनी मुश्किल होगी,
जबकि गाँवोमें हर बीड़ी पीने वाले की जेब में ये मिल सकती है,
आधी उम्र पार हम कह सकते हैं -एक ज़माना था ,जब गाँवों में माचिस की डिबिया मानों केसर की डिबिया जैसी मोहाल होती थी.
शायद ही किसी घर में छिपा के रखी रहती हो.
आग बोरसी में ,राख में कंडी दबा के ज़िन्दा रखी जाती थी ,उनके घर में,जिनके घर हुक्का चीलम पीने वाले रहते थे. पता नहीं कितना सच कितना झूठ ,पर लोग कहते थे तमाखू पीने से पेट में गैस नहीं बनती. जब भी मौक़ा लगता लोग हुक्का गुड़गुड़ाने लगते.
अपनी याद में जब पहली बार गाँव गए.देखा शाम होते होते दरवाज़े पर कुछ ज़्यादा ही चहल पहल है.
हुक्का-चीलम तैयार हो रही है, कुछ लोग गुड़क़-गुड़क़ के हुक्का पी रहे, चारपाइयों पे बैठ के बातचीत . हाँ-हुंकारी.चीलम ठंडी हो गई. बाबूजी ने उधर से गुजरते किसी बच्चे को आवाज़ लगाई
. ‘तनि चीलम चढ़ाय ली आव’
ठंडी चीलम की राख गिरा के फिर से तमाखू रख के उस पर कंडी की आग रखी,आ गई चीलम चढ़ के. इसी अंदेशे से अक्सर बच्चे उधर से गुज़रने से कतराने लगते थे
चीलम पे बीच में एक कंकण, उसके ऊपर गीला वाला तमाखू, फिर कंडी की आग. नीचे हुक्के में पानी.हुक्का तैयार. घर में गड़गड़ा भी था. पीतल का हुक्का और नारियल का हुक्का भी.
चीलम तो मिट्टी की ही बनी होती.
जबकि गाँवोमें हर बीड़ी पीने वाले की जेब में ये मिल सकती है,
आधी उम्र पार हम कह सकते हैं -एक ज़माना था ,जब गाँवों में माचिस की डिबिया मानों केसर की डिबिया जैसी मोहाल होती थी.
शायद ही किसी घर में छिपा के रखी रहती हो.
आग बोरसी में ,राख में कंडी दबा के ज़िन्दा रखी जाती थी ,उनके घर में,जिनके घर हुक्का चीलम पीने वाले रहते थे. पता नहीं कितना सच कितना झूठ ,पर लोग कहते थे तमाखू पीने से पेट में गैस नहीं बनती. जब भी मौक़ा लगता लोग हुक्का गुड़गुड़ाने लगते.
अपनी याद में जब पहली बार गाँव गए.देखा शाम होते होते दरवाज़े पर कुछ ज़्यादा ही चहल पहल है.
हुक्का-चीलम तैयार हो रही है, कुछ लोग गुड़क़-गुड़क़ के हुक्का पी रहे, चारपाइयों पे बैठ के बातचीत . हाँ-हुंकारी.चीलम ठंडी हो गई. बाबूजी ने उधर से गुजरते किसी बच्चे को आवाज़ लगाई
. ‘तनि चीलम चढ़ाय ली आव’
ठंडी चीलम की राख गिरा के फिर से तमाखू रख के उस पर कंडी की आग रखी,आ गई चीलम चढ़ के. इसी अंदेशे से अक्सर बच्चे उधर से गुज़रने से कतराने लगते थे
चीलम पे बीच में एक कंकण, उसके ऊपर गीला वाला तमाखू, फिर कंडी की आग. नीचे हुक्के में पानी.हुक्का तैयार. घर में गड़गड़ा भी था. पीतल का हुक्का और नारियल का हुक्का भी.
चीलम तो मिट्टी की ही बनी होती.
हम लोग एक बुझव्वल बुझाते थे
“एक गाँव में आग लगी
दूसरे गाँव में धुआँ
चलो यार देख आएँ
किस गाँव में कुँआँ”
हमारी पीढ़ी के लोगों को जवाब मालूम है न ‘हुक्का’
अब के बच्चे क्या ख़ाक जवाब दे पाएँगे.
वे बताने पर भी गूगल पर खोजेंगे.
“एक गाँव में आग लगी
दूसरे गाँव में धुआँ
चलो यार देख आएँ
किस गाँव में कुँआँ”
हमारी पीढ़ी के लोगों को जवाब मालूम है न ‘हुक्का’
अब के बच्चे क्या ख़ाक जवाब दे पाएँगे.
वे बताने पर भी गूगल पर खोजेंगे.
मेरे घर भी आग बोरसी में रहती थी. लेकिन कभी कभी चूक हो जाती तो आग दूसरे के घर माँगने जाना पड़ता था.
दरअसल बात ये बताने वाले थे कि अपनी याद में जब पहली बार गाँव गए तो दूसरे के घर आग माँगने भेजा गया क्योंकि कुछ लोगों के हुक्का पानी का इंतज़ाम करना था, हमारे लिए ये बिलकुल अजूबा था. आग लाएँ ? कहाँ से कैसे?और दिमाग़ में आया ये प्रश्न उस समय अनुत्तरित ही रहा कि पहली बार किसके घर और कैसे आग जलायी गई.
दिसम्बर के सर्द क़ुहरे भरे जाड़े में आग तापिए, सोचिए, देखिए और जानिए विज्ञान के चमत्कारों को . ये जानना दिलचस्प होगा कि कैसे आग डिबिया में, लाइटर में सहेजी जाने लगी.
अगले साल मिलते हैं.अलविदा २०१७
Comments
Post a Comment