यादों की गलियों में

1-
‘मुआयना’ बचपन से ही हमारे लिए अनजाना शब्द नहीं था. इसके साथही एक तस्वीर उभरती थी .
पापा की दिनरात की व्यस्तता. फ़ाइलों की तैयारी. और मुआयने के बाद राहत की साँस. जब कभी घर का ऐसा माहौल होता समझ आ जाता कि कोई अधिकारी मुआयना (inspection)करने आ रहा है.
इसी तरह ‘मूवत्तल, ‘बर्खास्त’, ‘हल्का, दाख़िला , तक़ाबी,पेशी, अदालत,कचहरी, फ़ैसला, तारीख़ मुस्तकिल जैसे बहुत से शब्द हमारे ज़ेहन में अनायास ही रच बस गए थे . कभी इनका मतलब नहीं पूछा. न ही शब्दकोश देखा. इनको सुनते हुए भी कोई न कोई तस्वीर ख़ुदबख़ुद बन जाती थी.
इसी वजह है कि हमें सल्तनत काल से लेकर ब्रिटिशकाल की भू-राजस्व व्यवस्था पढ़ना-पढ़ाना भी क़िस्सा कहने-सुनाने जैसा रोचक लगता है.
आज कॉलेज में लॉ की परीक्षाओं में आंतरिक उड़न दस्ते में चलते हुएकिसी छात्रा का पेपर उलट पुलट के देखा तो कुछ देर देखते ही रह गए .
पेपर था-राजस्व अदालत का.
शब्द चित्र बन कर हमारी आँखों के सामने घूमने लगे .
खसरा-खतौनी,दाख़िल-ख़ारिज, भूमि का पट्टा ,राजस्व अदालतें
सालों पहले की बातें दिमाग़ में घूम गईं.
किसी मुक़दमें का फ़ैसला पापा कई पेज में अपने हाथों से लिखते. किसी शाम को किसी मुक़दमे की बहस की चर्चा सुनना अपने आप में दिलचस्प होता.कई सच्ची पर रोचक कहानियाँ सुनने को मिलतीं.
लगभग ४५ साल का होने तक हमने कोर्ट केवल फ़िल्मों में देखा था.पहली बार कोर्ट और कोर्ट की कार्यवाही भी पापा के साथ ही देखा, सीतापुर में .जब किसी मुक़दमे में गवाही करने पापा को रिटायर होने के बाद आना पड़ा।
मामला था -एक अमीन ने किसी ग़रीब की मालगुज़ारी वसूल के ख़र्च कर दिया, वो ग़रीब बेचारा पापा के सामने आ के रोते हुए न्याय की फ़रियाद कर गया। पापा उस समय मिश्रित (मिसिरिख) में तहसीलदार थे।फिर क्या था पापा की दिल ऐसा पिघला कि उन्होंने पूरी जाँच पड़ताल करके उस अमीन को मूवत्तल होने की नौबत ला दी थी.इतना ही नहीं उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.
अपने गाँव जाते तो किसी को वृद्धावस्था पेन्शन दिलवाते किसी की ज़मीन जायदाद से जुड़ी समस्या में उचित सलाह.
अपनी लाख व्यस्तताओं के बीच पापा की कोशिश होती थी मुक़दमे की तारीख़ उनकी वजह से न टले, ताकि फ़रियादी को त्वरित न्याय मिल सके.
उनके कैम्प ऑफ़िस की वर्षों पहले हुई ‘पुकार ‘भी कानों में बजने लगी
“फ़लाँ वल्द फ़लाँ हाज़िर हों”

2-
नेताओं की डिग्रियों को लेकर मची खींचा तानी में हमें इन्स्पेक्टर चाचा याद आते हैं।श्री लोकनाथसिंह।
वो एल॰आई॰सी॰ में काम करते थे ।किस पद पर थे ये भी नहीं मालूम। लेकिन सब लोग उन्हें इंस्पेक्टर साहब ही कहते थे।
1978-79 में जब हम सातवीं जमात में पढ़ते थे। बहुत कम लोगों के पास बाइक होती थी,तब वे बुलेट से चलते थे । दग़दग़ दग़ दग़ करती बुलेट की आवाज़ और उस पर बैठे चाचा। दूर से ही हो जाती थी उनके आने की ख़बर। जब बुलेट पुरानी हो गई किसी ने कहा बेच क्यों नहीं देते। भोजपुरी कहावत में बोलते -“खुरपी के का बेचले का बंधक धइले” मतलब बेचने पर कितना मिलेगा ही जो बेच दें।पड़ी रहने देते हैं।
वैसे उससे उनका लगाव गहरा रहा होगा। कहावत तो अपने मज़ाक़िया स्वभाव की वजह से कही होगी।
चंदौली में हम लोग पापा के तबादले के बाद पहुँचे थे। पता चला वो गाँव के हमारे क़रीबी हैं, एक ही पूर्वज की संतान।हम लोगों की पारिवारिक नज़दीकी हो गई यहाँ।कई मज़ेदार बात बताते थे चाचा। उसी में से एक क़िस्सा डिग्रियों का है।
हाँ तो डिग्री वाली बात यूँ है कि एक बार चाचा के घर में मेहमान आए थे। उनके छोटे बच्चे ने ज़मीन पर टट्टी कर दी । बच्चे की माँ उसे साफ़ करने के लिए इधर उधर देखने लगी । उसे एक मोटा काग़ज़ दिखा । उसे फाड़ कर उससे गंदगी साफ़ करने ही जा रही थी कि किसी की नज़र पड़ी । बोला अरे अरेरेरेरे! “ई त बाऊजी क डिग्री हव’” और इस तरह सर्टिफ़िकेट जाते जाते बच गई।
हो सकता है ऐसे ही नेताओं / नेत्रियों की बड़ी डिग्रियाँ गुम हो गई हों।

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