ज़रा सी हँसी
चाय कब से पी रहे हैं सही सही याद नहीं, पर अब हाल ये है कि दूध अदरक वाली अच्छी चाय न मिले तो किसी नशेड़ी की तरह परेशान हो जाते हैं हम.
अभी कुछ दिनों पहले गाँव जाना हुआ. साफ़-सफ़ाई के दौरान चीनी मिट्टी के कुछ धूल भरे बर्तन मिले , जैसे केटली, दूधदानी, शक्करदानी. बिना इस्तेमाल किए हुए .एक नहीं बल्कि दो सेट थे . कोई घर में बड़ा शौक़ीन रहा होगा जो तिलकहरू या देखनहरू के लिए टी सेट लाया रहा होगा.. .देख के इतना अन्दाज़ तो लग ही गया कि इनके साथ के कप कब के टूट चुके हैं. हमारे जैसे घरों में पहले टी सेट तो आ जाते थे, पर इस्तेमाल केवल कप होते थे. कभी-कभी प्लेट भी.कप में तो चाय पी ही जाती थी, साथ ही प्लेट में पलट के भी हम लोग चाय सुड़क -सुड़क के चाय पीते थे . कभी कभी खेल भी करते कि कौन ज़्यादा तेज़ आवाज़ के साथ सुड़क्ता है. धीरे धीरे समझ आया , चाय सिप करके पीनी चाहिए.
बहरहाल ,इन बचे खुचे बर्तनों का मोह छोड़ते हुए हमने इन्हें घर में काम करने वालों को देना ठीक समझा.
कुछ स्टील के कप भी थे.
उन्हें देख के ध्यान आया कि ९० के दशक के शुरुआती दिनों में मध्यम आय वर्ग के लोगों के घरों में स्टेन्लेस स्टील के कप आए.
घर के मालिक मुख्तियार ने चैन की साँस ली कि चलो अब रोज़ रोज़ की कप प्लेट की टूटफूट से फ़ुर्सत मिली.
बहरहाल शुरू शुरू में स्टील के कप बड़ा दर्द दिए .
वो ऐसे कि गरम चाय कि प्याली जैसे ही होंठ से लगाया कि छन्न से मुँह जल जाता. कुछ दिनों तक सब कुछ बेस्वाद लगता.फिर तो आदत बन गई और चाय के जले छाछ भी फूँक के पीने लगे.
दूसरे,ये कप बाहर से देखने में बड़े होते थे . चाय इनमे थोड़ी ही आती थी.
इन स्टील के कपों को देखकर एक मज़ेदार घटना याद आ गई.
एक बार पड़ोस में कीर्तन चल रहा था .लोग झाल मंजीरा के साथ तरह तरह की धुन लय तान में गाए जा रहे थे. सबके लिए चाय-पानी का इंतज़ाम था .नए नए स्टील के कप में चाय भी परोसी जा रही थी.अचानक चाय कम पड़ गई. एक साथी ने दूसरे से कहा हम आधा-आधा कर लेते हैं. दूसरे कप में थोड़ी सी चाय पलटी गई. दोस्त आश्चर्य मिश्रित मुस्कान के साथ बोला.
बहरहाल ,इन बचे खुचे बर्तनों का मोह छोड़ते हुए हमने इन्हें घर में काम करने वालों को देना ठीक समझा.
कुछ स्टील के कप भी थे.
उन्हें देख के ध्यान आया कि ९० के दशक के शुरुआती दिनों में मध्यम आय वर्ग के लोगों के घरों में स्टेन्लेस स्टील के कप आए.
घर के मालिक मुख्तियार ने चैन की साँस ली कि चलो अब रोज़ रोज़ की कप प्लेट की टूटफूट से फ़ुर्सत मिली.
बहरहाल शुरू शुरू में स्टील के कप बड़ा दर्द दिए .
वो ऐसे कि गरम चाय कि प्याली जैसे ही होंठ से लगाया कि छन्न से मुँह जल जाता. कुछ दिनों तक सब कुछ बेस्वाद लगता.फिर तो आदत बन गई और चाय के जले छाछ भी फूँक के पीने लगे.
दूसरे,ये कप बाहर से देखने में बड़े होते थे . चाय इनमे थोड़ी ही आती थी.
इन स्टील के कपों को देखकर एक मज़ेदार घटना याद आ गई.
एक बार पड़ोस में कीर्तन चल रहा था .लोग झाल मंजीरा के साथ तरह तरह की धुन लय तान में गाए जा रहे थे. सबके लिए चाय-पानी का इंतज़ाम था .नए नए स्टील के कप में चाय भी परोसी जा रही थी.अचानक चाय कम पड़ गई. एक साथी ने दूसरे से कहा हम आधा-आधा कर लेते हैं. दूसरे कप में थोड़ी सी चाय पलटी गई. दोस्त आश्चर्य मिश्रित मुस्कान के साथ बोला.
“अरे मर्दे इ त पेनी लउकै लगल ।
(पेनी-पेंदी)
(पेनी-पेंदी)
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