बस युँ ही
अपने किचन की खिड़की से चाय बनाते-बनाते मैं देखती हूँ,लोगों को आते जाते ।
सुबह सबेरे स्कूल के बच्चे। कोई बच्चा अपनी मम्मी या पापा की उंगली पकडे जा रहा। किसी की मम्मी खुद बैग लिए हैं और बच्चा स्कूल जा रहा है। कोई बच्चे को कंधे पर लिए जा रहा है। कुछ बच्चे रोते हुए भेजे जा रहे हैं। कुछ बच्चे रिक्शों पर लदे फंदे जा रहे हैं तो कुछ बाइक,स्कूटी या फिर सायकिल से स्कूल की यूनिफार्म में। सबसे ज्यादा मस्ती रिक्शे से जाने वाले बच्चे करते हैं। देख के यही लगता है ,सब पढ़ रहे हैं सब बढ़ रहे हैं।
सुबह सबेरे स्कूल के बच्चे। कोई बच्चा अपनी मम्मी या पापा की उंगली पकडे जा रहा। किसी की मम्मी खुद बैग लिए हैं और बच्चा स्कूल जा रहा है। कोई बच्चे को कंधे पर लिए जा रहा है। कुछ बच्चे रोते हुए भेजे जा रहे हैं। कुछ बच्चे रिक्शों पर लदे फंदे जा रहे हैं तो कुछ बाइक,स्कूटी या फिर सायकिल से स्कूल की यूनिफार्म में। सबसे ज्यादा मस्ती रिक्शे से जाने वाले बच्चे करते हैं। देख के यही लगता है ,सब पढ़ रहे हैं सब बढ़ रहे हैं।
देखते-देखते कभी कभी मैं भी अपने ख्यालों में डूबने उतराने लगती हूँ। इनमें से किसी में अपनी और अपने बच्चों की सूरत देखने लगती हूँ।
यही बच्चे कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। आज 15 अगस्त को सेंट डॉन बॉस्को स्कूल लखीमपुर 12th 2017 के टॉपर्स और उनके माता-पिता को सम्मानित कर रहा था। मैं भी अपने छोटे बेटे दिव्यांशु के साथ वहाँ थी। इस मौके पर गर्व की अनुभूति के साथ- साथ यह भी महसूस हो रहा था कि अब डॉन बॉस्को छूटा जा रहा है। 20 सालों से नाता जो था। साल भर में कई बार यहाँ आना होता था। टीचर्स-पेरेंट्स मीटिंग में,स्पोर्ट्स डे पर ,वार्षिकोत्सव में,प्रदर्शनी में....
हमारे दोनों बच्चों अंशुमान और दिव्यांशु की पाठशाला में आज की यादगार तस्वीर।


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