सेनापति


नीले फ्राक़ वाली  बेहद ख़ूबसूरत, बातूनी लड़की जिसने कभी गुलदस्ता ले के , ठुड्डी  पर तिल बनवा के, स्टूडियो जा के फ़ोटो उतरवायी थी, अब  थोड़ी बड़ी हो चुकी थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि उसकी पढ़ाई को लेके अम्मा - पापा  फ़िक्रमंद हों.
उसके सभी भाई-बहन  पापा के तबादले के साथ-साथ दर-बदर होते रहतेहर दो तीन साल बाद  नई जगह,नए मकान , नए स्कूल, नई स्कूल ड्रेस, नाम कटाना , नाम लिखाना,चलता रहता
कुछ दोस्त बनते कुछ छूटते.
 कक्षा - में शिशु मंदिर में पढ़ने वाली वो लड़की  कक्षा में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज रखती थी.
पिताजी का तबादला,नई जगह  चार्ज लेना, ढेर सारी दिक़्क़तों के साथ  मिड-सेशन में फ़ैसला लिया  गया कि सबको चलना है    नए शहर . सबका कुछ कुछ छूट रहा था. दोस्त,मित्र, स्कूल...
पर उस घर की सबसे छोटी लड़की  अपने पद की ज़िम्मेदारी से ज़्यादा परेशान थी.
अरे !हम अपने स्कूल में सेनापति हैं !कैसे छोड़ के जाएगें यह सोच के उस छोटी लड़की की आंख भर आई उसके सिपाही छूट रहे थे और छूट रहा था उसका किला जहां वह दौड़ती ,दौड़ाती ,पढ़ती ,पढ़ाती थी उसकी यादों में पंद्रह अगस्त ,छब्वीस जनवरी , जयहिंद ,सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा ,तिरंगा ,वंदे मातरम् सब घूम रहा था
वह बोल पड़ी -
अरे हम अपने स्कूल मेंसेनापतिहै कैसे  छोड़के जाएँगे. “सब लोग हंस पड़े उसकी इस बात पर .
बड़ों की समस्याओं के आगे उसका पद ज़्यादा अहमियत नहीं पा सका
वह लड़की आज भी सेनापति है झंडा लिए आज भी अपने सिपाहियों से कह रही है -
वीर तुम बढ़े चलो  
कि -आओ प्यारे वीरों आओ,देश धर्म पर बलि बलि जाओ निसंदेह आज भी अपने बच्चों की फेवरिट सेनापति है ,मार्ग दर्शक है  
फ़्रेंड्शिप डे पर उसकी कलाई  से क़ुहनी तक,भर के बैंड बाँधते हैं बच्चे. क्यों बाँधें

वह लड़की आज स्कूली बच्चों की फ़ेवरिट टीचर है.

Comments

Popular posts from this blog

NEP 2020 और महाविद्यालय परिसर

लखनिया दरी और चुनार के यात्रा संस्मरण

आइस पाइस