मेरा पहचान चिन्ह , हमारी जड़ें
1-
पहली बार identification Mark, (पहचान चिन्ह) की ज़रूरत पड़ी नौकरी लगने के बाद.
फिर तो LIC के लिए , पैन के लिए,आधार के लिए और पासपोर्ट के लिए सभी जगह ज़रूरत पड़ने लगी.
बचपन में जिसने शरारत न की हो उसका पहचान चिन्ह क्या होता होगा मालूम नहीं.
गाँव जाते ही थे .गरमियों में . तब घर के बरामदे में पहुँचने के लिए पाँच से छः सीढ़ियाँ थीं और बग़ल में ही मंदिर, महामाई दाई का. वहीं हम लोग ऊँच-नीच का खेल खेलते थे. खेलते-खेलते अचानक किसी ने धक्का दिया और हमारा माथा मंदिर के चबूतरे के कोने से जा टकराया. ख़ून की धारा बहने लगी.
घाव तो ठीक हो गया पर अपना निशान छोड़ गया,
दूसरी बार एक दूसरे घर की चौखट पर गिरे और माथे के दूसरी ओर चोट लगी. हालाँकि रूलाई तब आइ जब किसी ने बताया की माथे से ख़ून टपक रहा है.
फिर तो LIC के लिए , पैन के लिए,आधार के लिए और पासपोर्ट के लिए सभी जगह ज़रूरत पड़ने लगी.
बचपन में जिसने शरारत न की हो उसका पहचान चिन्ह क्या होता होगा मालूम नहीं.
गाँव जाते ही थे .गरमियों में . तब घर के बरामदे में पहुँचने के लिए पाँच से छः सीढ़ियाँ थीं और बग़ल में ही मंदिर, महामाई दाई का. वहीं हम लोग ऊँच-नीच का खेल खेलते थे. खेलते-खेलते अचानक किसी ने धक्का दिया और हमारा माथा मंदिर के चबूतरे के कोने से जा टकराया. ख़ून की धारा बहने लगी.
घाव तो ठीक हो गया पर अपना निशान छोड़ गया,
दूसरी बार एक दूसरे घर की चौखट पर गिरे और माथे के दूसरी ओर चोट लगी. हालाँकि रूलाई तब आइ जब किसी ने बताया की माथे से ख़ून टपक रहा है.
नौकरी में सर्विस बुक बनते समय हमने लिखा
* दोनो भौ के ऊपर कटे का निशान*
कहीं भी लिखते समय महमाई देवी का ये आशीर्वाद ही समझ लेते हैं.
* दोनो भौ के ऊपर कटे का निशान*
कहीं भी लिखते समय महमाई देवी का ये आशीर्वाद ही समझ लेते हैं.
आज देखा मंदिर पटाव के बाद सड़क के बराबर हो गया है और घर की कुछ सीढ़ियाँ भी ज़मीन के अंदर दब गई हैं.
गाँव का घर
और मंदिर
#बचपन की यादें
गाँव का घर
और मंदिर
#बचपन की यादें
2-जब मैं छोटा बच्चा था
बड़ी शरारत करता था...
नहीं नहीं मैं तो बहुत ही कम शरारत करती थी.
बात तब की है जब तखती पर लिखते थे.
लिखते कम थे उसको पचारने, घोटारने, सुत्ता मारने में ज़्यादा समय लगाते. मैं अपनी पीढ़ी में तखती पर लिखने वाली शायद अंतिम सदस्य थी.
लिखते कम थे उसको पचारने, घोटारने, सुत्ता मारने में ज़्यादा समय लगाते. मैं अपनी पीढ़ी में तखती पर लिखने वाली शायद अंतिम सदस्य थी.
कंधे पे बस्ता, एक हाथ में पटरी दूसरे में खड़िया की दवात लिए पैदल पहुँचते थे स्कूल. किसी दिन भूल गए दवात ले जाना. अब क्या करें. बग़ल वाली सहेली से कहा हमें अपने दवात में लिखा लो. मामला इस शर्त पर तय हुआ कि अगले दिन हम उसे अपने दवात में लिखवा लेंगे.
हुआ क्या कि लिखते लिखते अचानक उसकी दावात हमसे लुढ़क गई. येल्लो ग़रीबी में आटा गीला.
धूप के दिनों में बाहर क्लास लगती ही थी, सारी खड़िया मिट्टी की ज़मीन पर फैल गई. अब वो ग़ुस्सा हो के कहने लगी हमारा खड़िया वापस करो.जितनी दूर फैला है उतनी बड़ी खड़िया दो. समझ तो आया कि चालाकी बतिया रही है. पर
हमने भी न वक़ील, ना दलील, न अपील की .
दूसरे दिन उतनी खड़िया ला के दे दी. हिसाब बराबर. अब याद आता है तो सोचते हैं वो सहेली ज़रूर बिज़नेस वुमन बनी होगी.
हुआ क्या कि लिखते लिखते अचानक उसकी दावात हमसे लुढ़क गई. येल्लो ग़रीबी में आटा गीला.
धूप के दिनों में बाहर क्लास लगती ही थी, सारी खड़िया मिट्टी की ज़मीन पर फैल गई. अब वो ग़ुस्सा हो के कहने लगी हमारा खड़िया वापस करो.जितनी दूर फैला है उतनी बड़ी खड़िया दो. समझ तो आया कि चालाकी बतिया रही है. पर
हमने भी न वक़ील, ना दलील, न अपील की .
दूसरे दिन उतनी खड़िया ला के दे दी. हिसाब बराबर. अब याद आता है तो सोचते हैं वो सहेली ज़रूर बिज़नेस वुमन बनी होगी.
क़ट्टी तो कर नहीं सकते थे, क्योंकि उन्ही के साथ गुट्टक , रस्सी कूदना, एक्कट-दुक्कट, आइस-पाइस खेलना होता था.
- एक दूसरी मज़ेदार बात उसके काफ़ी दिन बाद की है,
घर में पढ़ाने मास्साब आते थे. अंग्रेज़ी .
भइया और दीदी को. हम लोग भी cow पर essay -वेसे कभी कदा पूछ लेते थे.
एक दिन यों हुआ लाइट चली गई.
आज की तरह इन्वर्टर तो था नहीं. पूरी पढ़ाई बिजली की आँख मिचौली के साथ ही हुई.
हाँ तो बता रहे थे मास्साब पढ़ाने आए और बिजली चली गई . हुआ कि लैम्प जला के लाओ. तब तक वे अंधेरे में ही कुछ बताते रहे. अचानक लाइट आ गई. उन्होंने देखा सामने कोई था ही नहीं. सब लोग धीरे-धीरे कर खिसक लिए थे.
इधर हम लोग दूसरे कमरे में फ़ीफ़ीफ़ीफ़ी कर के हँस रहे थे.
घर में पढ़ाने मास्साब आते थे. अंग्रेज़ी .
भइया और दीदी को. हम लोग भी cow पर essay -वेसे कभी कदा पूछ लेते थे.
एक दिन यों हुआ लाइट चली गई.
आज की तरह इन्वर्टर तो था नहीं. पूरी पढ़ाई बिजली की आँख मिचौली के साथ ही हुई.
हाँ तो बता रहे थे मास्साब पढ़ाने आए और बिजली चली गई . हुआ कि लैम्प जला के लाओ. तब तक वे अंधेरे में ही कुछ बताते रहे. अचानक लाइट आ गई. उन्होंने देखा सामने कोई था ही नहीं. सब लोग धीरे-धीरे कर खिसक लिए थे.
इधर हम लोग दूसरे कमरे में फ़ीफ़ीफ़ीफ़ी कर के हँस रहे थे.
इस घटना के बहुत बाद विज्ञापन आया.
जब मैं छोटा बच्चा था
बड़ी शरारत करता था
मेरी चोरी पकड़ी जाती
जब रोशनी करता बजाज.
बड़ी शरारत करता था
मेरी चोरी पकड़ी जाती
जब रोशनी करता बजाज.
# बचपन की यादें
3--अनारकली ऑफ़ आरा,
-आरा हिले छपरा हीले....
-तू लगावेलू जब लिप्स्टिक
हीलेला आरा डिस्टिक...
-तू लगावेलू जब लिप्स्टिक
हीलेला आरा डिस्टिक...
जैसी बातों से हमारा नाता मात्र मूवी या गाने से नहीं जुड़ता बल्कि एक ख़ास वजह है हमारे जुड़ाव की , वो है- हमारे ननिहाल का ज़िला ‘आरा’ होना.
जहाँ मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बार गई हूँ, बचपन में. बस, ट्रेन और इक्के की सवारी करते हुए. लगभग एक महीने के लिए .मौक़ा था-
लोकपर्व छठ का.
नानी की मानी गई मनौती पूरी होने पर अम्मा को यह पूजा एक बार करनी थी.
जहाँ मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बार गई हूँ, बचपन में. बस, ट्रेन और इक्के की सवारी करते हुए. लगभग एक महीने के लिए .मौक़ा था-
लोकपर्व छठ का.
नानी की मानी गई मनौती पूरी होने पर अम्मा को यह पूजा एक बार करनी थी.
नानी से हमारी मुलाक़ात होने के पहले ही वो तारा बन चुकी थीं। नानी के घर बड़े से आँगन में बँटवारे के बाद आठ दस परिवार रहते थे, शाम को ढ़ीबरी,लालटेन, चूल्हे की जलती लौ की रोशनी में हर रोज़ दिवाली जैसी लगती,जब सभी परिवार अपना अपना खाना बना रहे होते।घर के मर्द ज़्यादातर दालान या बैठक में ही होते.
छठ का पर्व आने वाला है जिसकी तैयारी ज़ोर शोर से चल रही है। पूरे गाँव की ख़ूब साफ़ सफ़ाई, एकदम चकाचक किया जा रहा है,हर काम में साफ़ सफ़ाई का विशेष ध्यान, किसके घर गेहूँ धुल गया, किसके घर आटा पिस गया.....
शाम को आँगन में छठ गीत दिवाली के पहले से ही शुरू हो जाते, ढेर सारी मामी, मौसी ,नानी, सब मिलके गा रही है. कोई चौके में खाना बनाते हुए कोई आँगन में नल से पानी भरते हुए राग में राग मिला रहा है, मैं लगभग दस साल की थी कुछ गीत सुनते सुनते मैं भी साथ साथ गा लेती थी,
शाम को आँगन में छठ गीत दिवाली के पहले से ही शुरू हो जाते, ढेर सारी मामी, मौसी ,नानी, सब मिलके गा रही है. कोई चौके में खाना बनाते हुए कोई आँगन में नल से पानी भरते हुए राग में राग मिला रहा है, मैं लगभग दस साल की थी कुछ गीत सुनते सुनते मैं भी साथ साथ गा लेती थी,
“केलवा जे फ़रेला घवद से ओपे सुग्गा मडराय”
“काँच ही बाँस के बहँगिया बहँगी लचकत जाय”
“साँझ भईल छठी रहलू तू कहवा”....
“काँच ही बाँस के बहँगिया बहँगी लचकत जाय”
“साँझ भईल छठी रहलू तू कहवा”....
थोड़ी देर बाद हाल चाल शुरू होती ,
फ़लाँ कल टाटा से आ रहे,
बोकारो, भिलाई, कलकत्ते, सेआने वाले लोग पहुँच चुके है....नौकरी पर से छुट्टी ले के लोग आ रहे हैं, छठ पूजा के लिए.
पूजा के लिए नई साड़ी,चूड़ीबिंदी,कई तरह के फल, सुपेली,सबकी ख़रीदारी करने संदेश बाज़ार या आरा तक गाँव के लोग जाते थे, चढ़ाने के लिए ठोकवा बन रहा है.और ढेरों तैयारियाँ.जो व्रत नहीं कर रहे वे व्रतियों का सहयोग कर रहे होते. व्रतियों का सहयोग करना भी पुण्य का काम माना जाता था.
फ़लाँ कल टाटा से आ रहे,
बोकारो, भिलाई, कलकत्ते, सेआने वाले लोग पहुँच चुके है....नौकरी पर से छुट्टी ले के लोग आ रहे हैं, छठ पूजा के लिए.
पूजा के लिए नई साड़ी,चूड़ीबिंदी,कई तरह के फल, सुपेली,सबकी ख़रीदारी करने संदेश बाज़ार या आरा तक गाँव के लोग जाते थे, चढ़ाने के लिए ठोकवा बन रहा है.और ढेरों तैयारियाँ.जो व्रत नहीं कर रहे वे व्रतियों का सहयोग कर रहे होते. व्रतियों का सहयोग करना भी पुण्य का काम माना जाता था.
हालाँकि सोन नदी पास ही बहती थी ,पर उस समय आजकल की तरह साधन न होने से गाँव में ही टेम्प्रेरी तालाब बनाकर वहीं खड़े होकर पूजा होती।पहले डूबते सूरज की फिर दूसरे दिन उगते सूरज की,
यद्यपि मान्यता है कि बेटों के लिए यह पर्व है पर अर्घ्य देते देते व्रती सूर्यदेवता से अपने पूरे परिवार की ख़ुशहाली की कामना न करते हों ऐसा नहीं हो सकता,
इतने क़रीब से छठ न देखा होता तो उस पर्व के मर्म को हम ना ही समझ पाते।सोशल मीडिया पर छठ की चहल पहल देख यादें ताज़ा हो गई।
इतने क़रीब से छठ न देखा होता तो उस पर्व के मर्म को हम ना ही समझ पाते।सोशल मीडिया पर छठ की चहल पहल देख यादें ताज़ा हो गई।
PS -आस्था का सैलाब दिनोंदिन ऐसा बढ़ता जा रहा है कि कुछ दिन बाद प्रशासन की अनुमति लेनी पड़ सकती है के कौन घर में अर्घ्य देगा और कौन घाट पे जा के।
प्रकृति पूजा के इस दिव्यपर्व पर सभी को मंगलकामनाएँ
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