मेला


मेला दिलों का आता है
कई बार आ के चला जाता है।
तीज त्यौहार, मेले ठेले.
उत्सव न हो तो जीवन कितना दूभर हो जाय।
आजकल सुबह सवेरे खासकर हिंदी न्यूज़ पेपर उठायें तो वजनी लगता है.पहला पूरा का पूरा पेज इश्तेहार.
पन्ना पलटते जाइए.संपादकीय वाला पेज छोड़कर ज्यादातर इश्तेहार. मालूम हो जाता कोई बड़ा त्यौहार आने वाला है।ढेर सारे पम्पलेट होते हैं अखबारों में. शहरों में त्यौहार या मेले का सीधा सम्बन्ध पैसों और खरीददारी से होता है. मुझे बड़ा सटीक लगता है ये कि
रौनकें कहाँ दिखाई देती हैं
अब पहले जैसी,
अखबारी इश्तेहार बताते हैं,
कोई त्यौहार आया है।।
समय के साथ बहुत कुछ बदला.अब तो अखबारों से ज्यादा व्हाट्सएप्प बताने लगा है त्योहारों की आमद।
बात चली तो बताऊं आज के बाद से महाविद्यालय में दशहरे का अवकाश घोषित हुआ.हमने क्लास के बाद सभी स्टूडेंट्स को विजयादशमी की बधाई दी.चलते-चलते पूछ ही लिया,मेले के पैसे मिलते हैं कि नहीं और मिलते हैं तो कितने। कुछ बच्चों ने बताया 500 .हमारे मुह से बरबस निकला ये तो बहुत ज्यादा है.बच्चे बोले कहाँ मैम इतने में भी मेलों में क्या मिलता है।ये सोच कर अच्छा लगा की मेला और मेले देखने की परम्परा अब भी ज़िंदा है.और बच्चे खुश हैं मेले से ज्यादा मेला देखने का पैसा मिलने की उम्मीद से।मन में प्लानिंग क्या क्या लेंगे उन पैसो से। कुछ हामिद की तरह भी होंगे जो चिमटा खरीद लाएंगे।
हम लोगों ने भी खूब देखी हैं रामलीलाएं और रावण दहन.उतरौला की रामलीला और उसके बाद विजयादशमी का मेला,अभी भी याद है.लखीमपुर में भी एक दो बार मेले में गए है। आपको बता दे कि यहां के मेले की जो चीज़ मशहूर है वो है-मीठा और नमकीन बड़े साइज़ का खाझा और माहेश्वरी की सॉफ़्टी। इसके सिवाय सब कुछ वही जो सामान्य मेलों में होता है।
अपने आसपास के गांवों की बात करें तो हमारे गांवों में होली दीवाली से ज्यादा क्रेज़ दशहरे का होता था.नौकरी पेशा वाले लोग दशहरे में ही अपने गाँव आते थे ।अब ऐसा है के नहीं मालूम नहीं।

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