‘बरधा भड़क जइहैं’
बात लगभग पैन्तीस साल पहले की है ।हम लोग अपने गाँव में थे।अपने क़स्बे से ज़ोरदार पटाखे ले कर गाँव गए थे। तब गाँवों में पटाखों का ज़्यादा चलन नहीं था।
घर पहुँचते ही बच्चों की टोली में कानोकान ख़बर फैल गई कि मुन्ना बहुत तेज़ पड़ाका लाए हैं।शाम होते होते सबमें बेचैनी कि जल्दी से इसे छुड़ाया जाय।
तय हुआ दरवाज़े पर पड़ाका छुड़ाते हैं। तब तक छोटक़ी अम्मा बोलीं -इहाँ मत छोड़ावा,
बच्चों की गोल थोड़ी आगे बढ़ी। पड़ाका कितना तेज़ है ये सोच कर कुछ बच्चे पहले से ही कान पर हाथ रख ले रहे थे।
तब तक बाबूजी ने कहा -इहाँ ना, बरधा (बैल) भड़क जइहैं।
बच्चे आपस में बोले हाँ , और क्या , बरधा भड़क जइहैं, चलो आगे.
लड़िकन की गोल थोड़ा और आगे बढ़ी।
सबके दरवाज़े की एक ही समस्या -बरधा भड़क जइहैं। बच्चे परेशान आख़िर पड़ाका छुड़ाएँ तो छुड़ाएँ कहाँ.
घर पहुँचते ही बच्चों की टोली में कानोकान ख़बर फैल गई कि मुन्ना बहुत तेज़ पड़ाका लाए हैं।शाम होते होते सबमें बेचैनी कि जल्दी से इसे छुड़ाया जाय।
तय हुआ दरवाज़े पर पड़ाका छुड़ाते हैं। तब तक छोटक़ी अम्मा बोलीं -इहाँ मत छोड़ावा,
बच्चों की गोल थोड़ी आगे बढ़ी। पड़ाका कितना तेज़ है ये सोच कर कुछ बच्चे पहले से ही कान पर हाथ रख ले रहे थे।
तब तक बाबूजी ने कहा -इहाँ ना, बरधा (बैल) भड़क जइहैं।
बच्चे आपस में बोले हाँ , और क्या , बरधा भड़क जइहैं, चलो आगे.
लड़िकन की गोल थोड़ा और आगे बढ़ी।
सबके दरवाज़े की एक ही समस्या -बरधा भड़क जइहैं। बच्चे परेशान आख़िर पड़ाका छुड़ाएँ तो छुड़ाएँ कहाँ.
आज सुप्रीम कोर्ट कह रहा है ‘बरधा भड़क जाईं ‘
‘हवा ख़राब होगी ‘कोई साँस नहीं ले पायेगा, पर कोई मानने को तैयार नहीं.
‘हवा ख़राब होगी ‘कोई साँस नहीं ले पायेगा, पर कोई मानने को तैयार नहीं.
धीरे-धीरे करके बढ़्ते-बढ़्ते बच्चों की टोली गाँव से थोड़ा बाहर आ चुकी है, कोई कह रहा है जल्दी से छुड़ाओ, देखा जाय कितना तेज़ है बम ।
कोई कान पर हाथ रखे कोई आँख भींचे खड़ा है। इस इंतज़ार में कि पता नहीं कितना तेज़ होगा
लेकिन ये क्या !! आग लगाने के बाद भी कोई आवाज़ नहीं। दूर से थोड़ा हिलाया डुलाया , कुछ नहीं
बच्चे निराश। अरे इ त फुस्सी निकल गइल,
कोई कान पर हाथ रखे कोई आँख भींचे खड़ा है। इस इंतज़ार में कि पता नहीं कितना तेज़ होगा
लेकिन ये क्या !! आग लगाने के बाद भी कोई आवाज़ नहीं। दूर से थोड़ा हिलाया डुलाया , कुछ नहीं
बच्चे निराश। अरे इ त फुस्सी निकल गइल,
तब से काफ़ी समय तक हँसने मुस्कुराने का एक बहाना बना रहा, ख़ासकर दिवाली पर, दुकान पर जब मुर्ग़ा छाप बम ख़रीदते है और दुकानदार उसकी तेज़ी की तारीफ़ करता है , मन में बरबस सवाल आ जाता है ।
कितना तेज? बरधा भड़क जइहैं ?
कितना तेज? बरधा भड़क जइहैं ?
Sweet memories of childhood
ReplyDeleteAunty❤ it is one lovely post. Filled with all the simplicity and humour.
ReplyDeleteThankyouu vidushi
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