हम होंगे कामयाब

किसी भी विद्यालयी प्रतियोगिता में जज बनना बड़ी बात नहीं होती किन्तु फैसला करना अवश्य बड़ी जिम्मेदारी होती है।
शिक्षण संस्थाओं में इस तरह की जिम्मेदारी निभाने के अवसर यदाकदा मिल ही जाते हैं।बड़ी मुश्किल घड़ी होती है।निष्पक्ष निर्णय कर पाने की।
हमारे महाविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान इसी जिम्मेदारी को निभाते हुए मैंने फिर-फिर ऐसा महसूस किया।
कार्यक्रम था---"नए भारत की संकल्पना" पर भाषण प्रतियोगिता।
हमारी नई पीढ़ी कैसा भारत चाहती है उसकी झलक उनकी बातों में दिखाई दी।
-अधिकतर छात्र भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहते थे।
-दूसरे नंबर पर उनका सपना था नौकरियों की सुलभता हो जिससे प्रतिभा पलायन न हो
-नंबर तीन शिक्षा,स्वास्थ्य एवम् सुरक्षा युक्त भारत का सपना
-नंबर चार जेंडर की बराबरी एवं उसका सम्मान ।
-स्वच्छता के साथ-साथ कृषि के विकास एवम् ग्राम देवता ,अन्नदाता के हालात बदलें इसकी भी उन्हें फिक्र थी।
अंतिम और रोचक बात ये कि
वे अन्धविश्वास मुक्त,बाबा मुक्त भारत भी चाहते हैं।
उनमें से कई छात्र छात्राएं पहली दफा मंच पर माइक से बोलने का साहस किये जबकि कुछ मंजे हुए भी थे। हमारी संकल्पना कब पूरी होगी नहीं कह सकते किन्तु अधिकांश ग्रामीण परिवेश से आये छात्रों को ऐसे अवसर देकर महाविद्यालय अवश्य उस यज्ञ में आहुति दे रहा है।
हमारे मुख्य अतिथि श्री रवि वर्मा जी का एक वक्तव्य विद्यार्थियो में जोश भरने के लिए पर्याप्त था कि 'प्रतियोगिता में जीतना तो बड़ी बात है ही किंतु 3 फ़ीट की यात्रा करके माइक तक आना भी कम उपलब्धि नहीं होती।'
#हम होंगे कामयाब।

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