बोन्साई
बौने सबसे पहले हमने सर्कसों में देखे। उतरौला में। जेमिनी सर्कस और बीच बीच में सबको हँसाते बौने जोकर।
बौनापन यानि विकलांगता समाज में सामान्य स्थिति नहीं मानी जाती। दया की नज़र से देखा जाता है उन्हें। लेकिन जापान की जानी पहचानी कला- बोनसाई, (पौधों को बौना बनाने की कला )का कहना ही क्या। बोनसाई पेड़ों को अपने घरों में सजाने के शौकीन अपने देश में भी कम नहीं है।
पंक्षी नदिया पवन के झोकों की तरह कलाएं भी सरहदों की सीमाओ में नहीं बाँधी जा सकती। उन्मुक्त होती है। जो चाहे अपना ले और इसी कला का एक खूबसूरत नमूना हमारे घर में भी है।
लगभग 25 साल पुराना बरगद का बोनसाई।
बनारस में हमारे भाई ने इस बरगद को हर तरह की धूप-छाँव, आंधी- पानी से बचा के नहीं बल्कि सभी झंझावातों को झेलते हुए पाला पोसा बड़ा किया है। बिना इस उम्मीद के कि बड़ा हो के छाया देगा।
बनारस जब भी जाते हैं,इसे देख के बरबस मुह से निकल ही जाता है -इतना बड़ा हो गया !
लगभग 25 साल पुराना बरगद का बोनसाई।
बनारस में हमारे भाई ने इस बरगद को हर तरह की धूप-छाँव, आंधी- पानी से बचा के नहीं बल्कि सभी झंझावातों को झेलते हुए पाला पोसा बड़ा किया है। बिना इस उम्मीद के कि बड़ा हो के छाया देगा।
बनारस जब भी जाते हैं,इसे देख के बरबस मुह से निकल ही जाता है -इतना बड़ा हो गया !
देखो तो,अपना गबरू जवान बरगद बोनसाई।


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