विलुप्त होने की कगार पर एक शब्द
‘इनार’ भोजपुरी और उड़िया भाषा का शब्द है जिसका मतलब है ‘कुआँ’
किसी समय जीवन की मूलभूत ज़रूरत ‘पानी’ को जनजीवन के नज़दीक लाने के लिए कुएँ बनाये गए होंगे.मनुष्य की रचनात्मकता एवं तकनीक का एक उत्कृष्ट नमूना कहलाया होगा.और अब ये इतिहास की चीज़ होने वाला है.
एक दिन में नहीं बने ,न ही एक की कोशिश से बने थे ये कुँए, पर जाने कहाँ खो गए.
किसी ज़माने में पुण्य का काम माना जाता था कुआँ खुदवाना. अब कुएँ, तालाब सरकारी काग़ज़ों में खुदते दिखते हैं. समय के साथ कुछ पाट दिए गए,कुछ जाल से ढाँक दिए गए.
नल और पम्प आ जाने से,कुओं का इस्तेमाल निश्चित रूप से कम या ख़त्म हो गया और साथ ही ख़त्म हो गई रहट की आवाज़ें. अच्छी तरह याद है बचपन में घंटों रहट को निहारते, उसके संगीत को सुनते हुए बीत जाया करता था.रहट सिंचाई का महत्वपूर्ण साधन होता था.
शादी ब्याह में इनार या कुआँ पूजन चाहे सांकेतिक ही हो पर उसका अपना स्थान बना हुआ है. इन्हें पाटने में शायद एक क्षण भी नहीं सोचा गया कि आख़िर क्यों हमारे रीति रिवाजों में कूप पूजन का महत्वपूर्ण स्थान है.
बचपन से देखा था गाँव में कई कुएँ थे . सबके नाम और उनकी पहचान भी थी.
कुकर न होने पर बटुली में दाल जल्दी नहीं पकती थी,इसलिए ऐसा मानते थे कि किसी ख़ास कुएँ के पानी से दाल जल्दी चूर जाती है . इसलिए कुएँ से दाल का पानी लाया जाता था.
बैलों , चौपायों को कुएँ से ला के पानी पिलाया जाता था. पूजा करने के लिए पानी भी कुएँ से ही निकाला जाता.बच्चे एक साथ नहाते थे कुएँ पर.
कुछ कुओं पर पक्की जगत और ऊँची दीवार बनी होती जबकि कुछ सिर्फ़ ईंट की बनी होती. जगत के किनारे जहाँ से पानी निकालते थे वहाँ रस्सी के निशान देख कर समझ में आ जाता था. कि इसे देख कर ही कहा गया है-
“करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निसान”
कुकर न होने पर बटुली में दाल जल्दी नहीं पकती थी,इसलिए ऐसा मानते थे कि किसी ख़ास कुएँ के पानी से दाल जल्दी चूर जाती है . इसलिए कुएँ से दाल का पानी लाया जाता था.
बैलों , चौपायों को कुएँ से ला के पानी पिलाया जाता था. पूजा करने के लिए पानी भी कुएँ से ही निकाला जाता.बच्चे एक साथ नहाते थे कुएँ पर.
कुछ कुओं पर पक्की जगत और ऊँची दीवार बनी होती जबकि कुछ सिर्फ़ ईंट की बनी होती. जगत के किनारे जहाँ से पानी निकालते थे वहाँ रस्सी के निशान देख कर समझ में आ जाता था. कि इसे देख कर ही कहा गया है-
“करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निसान”
कोई नाराज़ होता तो कुएँ में कूद के जान देने की धमकी देता. कहते-कहते कुछ लोग कुएँ में कूद ही जाते . बाद में गाँववाले बचाते.
‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी प्रेमचंद ने बहुत पहले लिखी है . जो समाज की छुआछूत असमानता की घृणित तस्वीर हमारे सामने लाती है.
मूल नक्षत्र में बच्चे का जन्म होने पर २७ कुओं का पानी लाना होता था. क्यों ? पता नहीं.धीरे धीरे कुओं की अनुपलब्धता पर २७ बार पानी निकालने का विधान कर दिया गया.
‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी प्रेमचंद ने बहुत पहले लिखी है . जो समाज की छुआछूत असमानता की घृणित तस्वीर हमारे सामने लाती है.
मूल नक्षत्र में बच्चे का जन्म होने पर २७ कुओं का पानी लाना होता था. क्यों ? पता नहीं.धीरे धीरे कुओं की अनुपलब्धता पर २७ बार पानी निकालने का विधान कर दिया गया.
कुएँ गाँव की औरतों के प्रपंच की जगह भी होते. क्योंकि बहुत दिनों तक नल सभी घरों में नहीं लगे थे.
मिर्ज़ापुर और राबर्टसगंज में पातालतोड़ कुएँ भी देखे . बहुत गहराई लिए होते थे बहुत लम्बी डोर लगती थी पानी निकालने में.
अगर पानी निकालते समय डोर छूट गई और बाल्टी कुएँ में ही गिर गई तो?? अब ऐसी हालत में काँटा मँगाया जाता और कोई एक्स्पर्ट बाल्टी को कुएँ से निकालता .
मिर्ज़ापुर और राबर्टसगंज में पातालतोड़ कुएँ भी देखे . बहुत गहराई लिए होते थे बहुत लम्बी डोर लगती थी पानी निकालने में.
अगर पानी निकालते समय डोर छूट गई और बाल्टी कुएँ में ही गिर गई तो?? अब ऐसी हालत में काँटा मँगाया जाता और कोई एक्स्पर्ट बाल्टी को कुएँ से निकालता .
कुएँ न होते तो ‘डोर’ ‘ और जगत’ रहट,शब्दों का इजाद भी संभवतः न होता. बढ़ती आधुनिकता और विज्ञान के नए नए आविष्कारों के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि समय के साथ ‘इनार’ और ‘कुआँ’ शब्द भी विलुप्त हो जाएँगे.
बहुत सुंदर और जीवन्त वर्णन.... मनमोहक झांकी प्रस्तुत करती हुई अतीत के लिए एक चीखती आवाज को आपने अभिव्यक्ति प्रदान की है।
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