विश्व टेलिविज़न दिवस
अत्तवार क दिन.गोपाल बो भौजी आपन दुआर बुहार के साफ़ सुथरा कर रही हैं. सवेरे से तैयारी चल रही है . सब लोग रामायन देखने आने लगे है . बच्चे ज़मीन पर, बड़ी बूढ़ी महिलायें बोरी,चटाई और मचिया पर, कुछ लोग बसखट पर . घर की बहुएँ घूँघट की आड़ से दरवाज़े की ओट पे जम गई हैं. बीचोंबीच मेज़ पर टीवी रखी हुई है. टीवी ऑन होने के साथ अनुशासित ढंग से सभी रामायण देखने में मगन. कोई हाथ जोड़ के भी बैठा है मानों सत्यनारायन भगवान की कथा सुन रहे हों.
दूसरे घरों की बहुएँ बाद में कॉमेंट्री सुन के , कल्पना करके ही ख़ुश हो लेतीं. और आश्चर्य करतीं .
हाँ ऐसा!!
बरसों पहले ये नज़ारा हमारे गाँव का था.
दूसरे घरों की बहुएँ बाद में कॉमेंट्री सुन के , कल्पना करके ही ख़ुश हो लेतीं. और आश्चर्य करतीं .
हाँ ऐसा!!
बरसों पहले ये नज़ारा हमारे गाँव का था.
धीरे-धीरे शादी ब्याह में दहेज की माँग में सायकिल -घड़ी की जगह टीवी ने ले ली थी. एक स्टैटस सिम्बल बन चुका था. पहले black and White टी॰वी॰. ही था.
पहले पहल जब रंगीन टी॰वी॰ रेमोट के साथ आया तो लगा इसकी क्या ज़रूरत. क्योंकि तब सिर्फ़ एक ही चेंनेल आता था. रिमोट की वक़त बाद में समझ आयी.
अब ये रिमोट बुज़ुर्ग लोगों के चैनेल खँगालने की मशीन बन गई है.TV बड़ों का अच्छा टाइमपास है.
1983के क्रिकेट वर्ल्ड कप , वही जिसमें कपिल ने करामात दिखायी थी, के समय हम लोग सुनते थे कि अब एक ऐसी चीज़ आएगी जिससे सब लोग घर बैठे ही क्रिकेट का आनंद लेंगे. दिल्ली में 26जनवरी की परेड अब कानों से नहीं सुनेंगे बल्कि आँखों से देखेंगे. पर भला कैसे. एतबार ही नहीं होता. क़तई समझ नहीं आता कि भला देखेंगे कैसे.
विज्ञान के जिन आविष्कारों से हमें बेइंतहा ख़ुशी मिली उसमें टी॰वी॰ ऊँचे पायदान पर है. जिसको कुछ दिन बाद ही लोग बुद्धू बक्सा बोलने लगे.
ये लकड़ी शीशे फ़ाइबर का बक्सा हमारे घर बड़े ग़लत समय आया. एक तो होली का त्योहार ऊपर से 12वीं का इम्तिहान और नई नई टी॰वी॰.सोचिए इनके बीच तालमेल बिठाना कितना मुश्किल था. जबकि विज्ञापन से ले के कृषि दर्शन तक सब कुछ मतलब सब कुछ देखते थे हम लोग .
तालमेल बैठाने का काम लाइट की आवाजाही से हो जाता. अब लैम्प की रोशनी में पढ़ा तो जा सकता था, पर टीवी ? नहीं न देख सकते थे. दिन भर में बीसियों बार Sorry for interruption .
दूरदर्शन के उन सीरियल की मन पे अभी भी छाप है. हमलोग, बुनियाद, नुक्कड़, रिश्ते, चित्रहार,ये जो है ज़िंदगी, रजनी और सबसे बढ़कर रामायण और महाभारत,
“मैं समय हूँ “ के साथ ही हम द्वापर युग में पहुँच जाते.
तमाम फ़िल्मे टीवी पर ही देखी गई,
आर्ट मूवी देखने का शौक़ टीवी से ही आया -पार, सारांश,अर्थ, मंडी,. स्मिता पाटिल हमारी प्रिय ऐक्ट्रेस बनी टीवी देखते-देखते. ख़ासकर अमूल के विज्ञापन में .
पहले पहल जब रंगीन टी॰वी॰ रेमोट के साथ आया तो लगा इसकी क्या ज़रूरत. क्योंकि तब सिर्फ़ एक ही चेंनेल आता था. रिमोट की वक़त बाद में समझ आयी.
अब ये रिमोट बुज़ुर्ग लोगों के चैनेल खँगालने की मशीन बन गई है.TV बड़ों का अच्छा टाइमपास है.
1983के क्रिकेट वर्ल्ड कप , वही जिसमें कपिल ने करामात दिखायी थी, के समय हम लोग सुनते थे कि अब एक ऐसी चीज़ आएगी जिससे सब लोग घर बैठे ही क्रिकेट का आनंद लेंगे. दिल्ली में 26जनवरी की परेड अब कानों से नहीं सुनेंगे बल्कि आँखों से देखेंगे. पर भला कैसे. एतबार ही नहीं होता. क़तई समझ नहीं आता कि भला देखेंगे कैसे.
विज्ञान के जिन आविष्कारों से हमें बेइंतहा ख़ुशी मिली उसमें टी॰वी॰ ऊँचे पायदान पर है. जिसको कुछ दिन बाद ही लोग बुद्धू बक्सा बोलने लगे.
ये लकड़ी शीशे फ़ाइबर का बक्सा हमारे घर बड़े ग़लत समय आया. एक तो होली का त्योहार ऊपर से 12वीं का इम्तिहान और नई नई टी॰वी॰.सोचिए इनके बीच तालमेल बिठाना कितना मुश्किल था. जबकि विज्ञापन से ले के कृषि दर्शन तक सब कुछ मतलब सब कुछ देखते थे हम लोग .
तालमेल बैठाने का काम लाइट की आवाजाही से हो जाता. अब लैम्प की रोशनी में पढ़ा तो जा सकता था, पर टीवी ? नहीं न देख सकते थे. दिन भर में बीसियों बार Sorry for interruption .
दूरदर्शन के उन सीरियल की मन पे अभी भी छाप है. हमलोग, बुनियाद, नुक्कड़, रिश्ते, चित्रहार,ये जो है ज़िंदगी, रजनी और सबसे बढ़कर रामायण और महाभारत,
“मैं समय हूँ “ के साथ ही हम द्वापर युग में पहुँच जाते.
तमाम फ़िल्मे टीवी पर ही देखी गई,
आर्ट मूवी देखने का शौक़ टीवी से ही आया -पार, सारांश,अर्थ, मंडी,. स्मिता पाटिल हमारी प्रिय ऐक्ट्रेस बनी टीवी देखते-देखते. ख़ासकर अमूल के विज्ञापन में .
जिस प्रोफ़ेसर यशपाल को हमने टी॰वी॰ के प्रोग्राम में बच्चों के प्रश्नों का जवाब देते देखा था. उन्हें वर्षों बाद सामने से देखने का मौक़ा लग पाया.
और भी ढेरों यादें.
और भी ढेरों यादें.
आजकल लोग कहते हैं मोबाइल ने बच्चों को बिगाड़ रखा है . हम लोगों के समय भी लोग कहते थे ,टी॰वी॰ बच्चों को बिगाड़ रहा है . आज मैं सोचती हूँ नई नई टेक्नॉलोजी हमारे ज्ञान के नए दरवाज़े खोलती है . बस ,हमें ये समझना है कि कब, कहाँ और कितना समय इसे हमें देना है.
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