क्या भूलूँ क्या याद करूँ .


आज लगभग तीस सालों बाद युवराज दत्त कालेज में टेबल टेनिस  का रैकेट पकड़ते ही मुझे अपना कॉलेज याद आ गया. टेबल टेनिस  में संदीप रेफ़री थे | थे तो  हमारे क़रीबी, पर ज़रा भी गलमनची नहीं किया, न तरफ़दारी|  नतीजा अफ़सोसनाक|   हम सेमीफ़ाइनल हार गए.
बहरहाल हम बहुत अच्छे खिलाड़ी नहीं थे , पर गेम्स रूम में ज़रूर जाते और ख़ाली समय में जिस-तिस गेम पे ज़ोर आज़माते. कैरम , चेस,चाइनीज़ चेकर, TT.
हम हमेशा ओलम्पिक के सूत्र वाक्य को पकड़ते
“खेल का महत्व जीतने से नहीं खेल में भाग लेने से है”.
इनडोर  गेम के साथ साथ आउटडोर गेम में भी ऐनुअल स्पोर्ट्स के समय भाग लेते .कबड्डी,रेस, और भी जो कुछ रहता सब में हिस्सा लेते हैं
शॉट पुट खेलते समय सबको आगाह कर देते हट जाओ भाई . किसी का भी सिर फूट सकता है. रेस में भी भाग लिए १०० मीटर की. बिना आदत के अचानक दौड़ने का नतीजा रहा कि रेस पूरी करने से पहले ही गिरे और पीछे पीछे एक दो और लड़कियाँ भी गिरी.
बावजूद इन सब के ,अपनी झोली ख़ाली नहीं है.
कुल मिलाकर अपने पास कालेज के रिले रेस का एक गोल्ड मेडल है.जो  सिल्वर कलर का है | 
# कालेज के दिन
KNPG College Gyanpur

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