शान्ता मैडम

उन गुरुओं के लिए जिनके लिए आज भी मन में आदर है---
बात 1992 की है एक तरफ बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद की संवेदनशील स्थिति और दूसरी तरफ हमारी थीसिस की टाइपिग लास्ट स्टेज में। वो भी लखीमपुर जैसे शहर में जहां उस समय इलेक्ट्रॉनिक टाइप मशीनें तक नहीं थी। लखनऊ से 21 दिसम्बर को जो वरुणा ट्रेन ली तो पूरी की पूरी बोगी खाली। बनारस पहुचकर स्टेशन पर रात भर रहे। जबरदस्त ठंडक थी। थोड़ी तबियत भी खराब थी। सुबह कर्फ्यू में ढील के बाद महमूरगंज स्थित घर पहुँचे। बहरहाल हमारी थीसिस दिसंबर 92 में जमा हो गई। पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में viva की डेट तय हुई।
हमारी expert थीं BHU में इतिहास की प्रोफ़ेसर के0 शांता मैडम। मेरे लिए बहुत ही सरल सहज, किन्तु उनके अपने कुछ आदर्श थे।
मैं उनसे मिली ।नितांत अपरचित होते हुए भी सहमति के साथ उन्होंने कहा यूनिवर्सिटी दूर है इसलिए गाड़ी ले लेना। हमने बताया टैक्सी बुक कर ली है। रिसर्च सुपरवाइजर डॉ अशोक कुमार शाही , और शांता मैडम के साथ मैं विश्वविद्यालय पहुच गई।
वायबा सम्पन्न हो गया। मैडमके साथ हम लोग तत्कालीन वाइस चान्सलर U P Singh से मिले।थोड़ी ही देर में मैडम को नकद TA वगैरह विश्वविद्यालय से मिल मिल गया।
अब देखिए -यूनिवर्सिटी से बाहर आते ही ।मैडम ने पूरा का पूरा TA ,DA का रुपया मुझे पकड़ा दिया।लाख मना करने के बावजूद बोलीं । नहीं,तुम्हारी गाडी से आई हूँ तो ये तुम्हारा ही होगा।(पता लगा वो किसी भी viva में अलग से T A नहीं लेती थीं)
वापस हम लोग बनारस आये ।एक बड़ा कार्य सम्पन्न होने से मैं बहुत खुश थी।मैडम को BHU कैंपस में उनके घर छोड़ा और उनकी मेड को 50 रूपये इनाम देकर वापस चली आई।
रात 8-9 बजते बजते एक आदमी मुझे पूछते हुए घर आया। शांता मैडम की चिट्ठी पकड़ाई।बोला मैडम बहुत नाराज हैं।मैडम ने 50 रुपये लौटाते हुए प्यार भरी डाँट लगाई थी चिट्ठी में।
दूसरेे दिन मैं मिठाई ले के मैडम के घर गई।सोचा माफ़ी भी मांग लूँगी।पर मिठाई के डिब्बे में से सिर्फ दो टुकड़े ले कर सब वापस कर दिया। बोलीं तुम्हारे बेटे की शादी में मिठाई खाऊँगी, कहाँ तो अभी हमारी शादी हुए ही 1 साल हुए थे और बेटे की शादी में उनको मिठाई खानी थी।:)।ऐसे थे उनके आदर्श और मुझ अनजान के लिये अपनापन।
दोबारा जब मिले तब वो रिटायरमेंट के बाद लंका के एक अपार्टमेंट में रहती थीं। 2001 में जॉब मिलने के बाद मै उनसे मिलने गई। डर के मारे खाली हाथ।यह जानकर बहुत खुश हुईं की मैं लेक्चरर हो गई हूँ।तब से अब तक कोई संपर्क नहीं हो सका।
ऐसे गुरु हजारों में एक होते हैं।
शाही सर पूरी घटना के गवाह है।उन्ही की सलाह पर ये अनुभव साझा कर रही हूँ।

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