आज का मौसम और घाघ की कहावतें
अब मौसम विज्ञानी मौसम का पता बहुत हद तक सही सही लगा लेते हैं । चाहे तूफ़ान आये या भूकंप। पशु पक्षी मनुष्य से पहले मौसम की आह्ट पा लेते हैं।जबकि आम लोग अंदाज से ही जान पाते है। इस मामले में हम निपट अज्ञानी हैं।हम तो हवा का रुख भी नहीं भांप पाते हैं कि पुरुवा है कि पछिमा।
आज की बात है।हमारा कैंपस पर्यावरण की दृष्टि से बहुत संपन्न है। यहां से 3 km दूर शांति विहार कालोनी ,जल भवन के पास व्यक्तिगत काम से हम गये थे। 3 बजे होंगे। तेज़ धूप थी ।थोड़ी ही देर में बूंदा बांदी ,और कुछ ही देर में झमाझम बारिश होने लगी।
हमें याद आया कल पितृपूजा के हवन के लिए आम की सूखी लकड़ी कैम्पस में घर के बाहर ही मैं रख आई थी। जल्दी से पड़ोस में फोन किया कि लकड़ियाँ हटा के कहीं अंदर रख दे।लेकिन पता चला वहाँ पानी की एक भी बूँद नहीं गिरी।
ये क्या माजरा है। समझ ही नहीं आया। अलबत्ता हंसी जरूर आ गई किे ऐसा भी हो सकता है।प्रकृति की ये कैसी आँख मिचौली।
हमें याद आया कल पितृपूजा के हवन के लिए आम की सूखी लकड़ी कैम्पस में घर के बाहर ही मैं रख आई थी। जल्दी से पड़ोस में फोन किया कि लकड़ियाँ हटा के कहीं अंदर रख दे।लेकिन पता चला वहाँ पानी की एक भी बूँद नहीं गिरी।
ये क्या माजरा है। समझ ही नहीं आया। अलबत्ता हंसी जरूर आ गई किे ऐसा भी हो सकता है।प्रकृति की ये कैसी आँख मिचौली।
कैसे तो घाघ पता लगा लेते थे।
करिया बादर जिउ डेरवावै।
भूरा बादर पानी लावै।।
भूरा बादर पानी लावै।।
या
धनुष पड़ै बंगाली,
मेह साँझ हो या सकाळी।।
मेह साँझ हो या सकाळी।।
बात चली तो हमारे एक परिचित ने आगे बात बढाई-
पूर्वा ज्यों पुरवाई पावे,सूखी नदिया नाव चलावे। शुक के आवे बदरी रही शनिचर छाय, घाघ कहें सुन घाघिनि बिन बरसे नहीं जाय। सावन मास बहे पुरवईया,बैल बेच के लो धेनु गईया।
इसी तरह घाघ की बहुत सी कहावतें हैं पर वो भी पहले सही होती थी अब उतना नहीं
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