हाय री सर्दी
१-इस सर्दी
दूध वाला, अख़बार वाला,
सब्ज़ीवाला, काम वाली,
सभी से एक सवाल
कहो,क्या हाल है ?
जवाब भी एक ही
‘न पूछो ,हाल बेहाल है’
पापी पेट का सवाल है”
बस ज़िंदगी चल रही है
दूध वाला, अख़बार वाला,
सब्ज़ीवाला, काम वाली,
सभी से एक सवाल
कहो,क्या हाल है ?
जवाब भी एक ही
‘न पूछो ,हाल बेहाल है’
पापी पेट का सवाल है”
बस ज़िंदगी चल रही है
२-ओ री सर्दी
बहुत हो गया तेरा ताक धिना धिन
तेरे सर्द थपेड़े ,
सुई सा चुभता ठंडा पानी,
उफ़्फ़
बहुत हुआ,
अब जा वापस !
पहाड़ों पे बर्फ़ गिरा
और बर्फ़, ख़ूब और ख़ूब बर्फ़ गिरा
ताकि गरमी में जब हम हों पसीने से तरबतर,
हमें मिल सके नहाने-निचोड़ने
और पीने को जी भर पानी.
बहें नहर और नदियाँ भर-भर के ,छितरा के
झूमें हमारे खेत खलिहान
और मस्ती से झूमें हमारे किसान
मैदानों से जा न!
छोड़ जा अपने पीछे गुलाबी ठंड.
बहुत हो गया तेरा ताक धिना धिन
तेरे सर्द थपेड़े ,
सुई सा चुभता ठंडा पानी,
उफ़्फ़
बहुत हुआ,
अब जा वापस !
पहाड़ों पे बर्फ़ गिरा
और बर्फ़, ख़ूब और ख़ूब बर्फ़ गिरा
ताकि गरमी में जब हम हों पसीने से तरबतर,
हमें मिल सके नहाने-निचोड़ने
और पीने को जी भर पानी.
बहें नहर और नदियाँ भर-भर के ,छितरा के
झूमें हमारे खेत खलिहान
और मस्ती से झूमें हमारे किसान
मैदानों से जा न!
छोड़ जा अपने पीछे गुलाबी ठंड.
३- पूरा घर अटा पड़ा है
रज़ाई, कम्बल, कोट क़ालीन/
शाल,स्वेटर , स्कार्फ़, मोज़े जूते/
एक निकालो दस गिरते हैं ,इस सर्दी.
इस सर्दी ,कभी-कभी
मन मेरा कहता है गांधी बाबा बन जाऊँ/
कोट-कमली किसी ठिठुरते को दे आऊँ/
सोच के ही दहल जाता है दिल/
अरे नहीं ,ना बाबा, मुझसे नहीं होगा/
अधनंगे फ़क़ीर आप ही रहो.
मैं जन्मदिवस पर तुझे याद कर /
एहसान करूँगी तुझ पर/
या तेरी प्रासंगिकता पर उठाऊँगी सवाल/
या ख़ुश हो लूँगी
किसी ज़रूरतमंद को/
देकर कोई कम्बल स्वेटर या शाल .
रज़ाई, कम्बल, कोट क़ालीन/
शाल,स्वेटर , स्कार्फ़, मोज़े जूते/
एक निकालो दस गिरते हैं ,इस सर्दी.
इस सर्दी ,कभी-कभी
मन मेरा कहता है गांधी बाबा बन जाऊँ/
कोट-कमली किसी ठिठुरते को दे आऊँ/
सोच के ही दहल जाता है दिल/
अरे नहीं ,ना बाबा, मुझसे नहीं होगा/
अधनंगे फ़क़ीर आप ही रहो.
मैं जन्मदिवस पर तुझे याद कर /
एहसान करूँगी तुझ पर/
या तेरी प्रासंगिकता पर उठाऊँगी सवाल/
या ख़ुश हो लूँगी
किसी ज़रूरतमंद को/
देकर कोई कम्बल स्वेटर या शाल .
४-ठक ठक ठक ठक
कालेज के गलियारों में
अपने ही जूते की आवाज़
रहस्यमयी लग रही है इस सर्दी/
इस धुँध में/
एक्के दुक्के लड़के प्राइवेट ट्यूशन से छूट के आ चुके हैं/
मैम क्लास चलेगी
हाँ .क्या पढ़ोगे/
कुछ भी बता दीजिए/
ठीक है.
लिखोगे? नहीं मैम ऐसे ही कुछ बता दीजिए/
बता क्या दें?
ठंड में अपनी ज़बान तक लड़खड़ा रही है..
अच्छा सुनो बच्चों
आज पढ़ते हैं फिर से अधनंगे फ़क़ीर की कहानी/
अहिंसा , सत्याग्रह,, सविनय अवज्ञा,
आज़ादी......
कालेज के गलियारों में
अपने ही जूते की आवाज़
रहस्यमयी लग रही है इस सर्दी/
इस धुँध में/
एक्के दुक्के लड़के प्राइवेट ट्यूशन से छूट के आ चुके हैं/
मैम क्लास चलेगी
हाँ .क्या पढ़ोगे/
कुछ भी बता दीजिए/
ठीक है.
लिखोगे? नहीं मैम ऐसे ही कुछ बता दीजिए/
बता क्या दें?
ठंड में अपनी ज़बान तक लड़खड़ा रही है..
अच्छा सुनो बच्चों
आज पढ़ते हैं फिर से अधनंगे फ़क़ीर की कहानी/
अहिंसा , सत्याग्रह,, सविनय अवज्ञा,
आज़ादी......
5-हाय रे ठंड!
आह रे ठंड!
अपनी इस ‘पूस की रात’/
मन में आयी ये बात/
जान है तो ज़हान है/
जब रग़ों में बर्फ़ बन जमने लगे ‘लहू’/
शाल, स्वेटर, मफ़लर /
सब हो जाए फ़ेल/
जलाओ जलाओ !
क़दम, आम, सागौन,लिपटिस, चंदन, नीम/
सिर्फ़ यही नहीं
अपनी तन्हाई,रुसवाई और ग़म/
जो मिले सो, जलाओ/
फिर लकड़ियों को सँवारते,
ख़यालों में विचरते/
दोनों गरम हाथों को रगड़ के/
हथेलियों से अपने ही गालों को सहलाते/
होंठों पे तैरते कोई गीत गुनगुनाओ/
अपनी इस ‘पूस की रात’/
मन में आयी ये बात/
जान है तो ज़हान है/
जब रग़ों में बर्फ़ बन जमने लगे ‘लहू’/
शाल, स्वेटर, मफ़लर /
सब हो जाए फ़ेल/
जलाओ जलाओ !
क़दम, आम, सागौन,लिपटिस, चंदन, नीम/
सिर्फ़ यही नहीं
अपनी तन्हाई,रुसवाई और ग़म/
जो मिले सो, जलाओ/
फिर लकड़ियों को सँवारते,
ख़यालों में विचरते/
दोनों गरम हाथों को रगड़ के/
हथेलियों से अपने ही गालों को सहलाते/
होंठों पे तैरते कोई गीत गुनगुनाओ/
‘हुज़ूर इस तरह भी न इतरा के चलिए.
सरे आम आँचल न लहरा के चलिए....
या यूँ/
“ हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है”
.....
जब आँख ही से न टपका तो फिर ‘लहू’ क्या है”
सरे आम आँचल न लहरा के चलिए....
या यूँ/
“ हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है”
.....
जब आँख ही से न टपका तो फिर ‘लहू’ क्या है”
6-इस सर्दी,जब भी घर से बाहर निकलो परके हुए पालतू कुत्ते जूली, पीलू, टाइगर।
दुम हिलाते कूँ कूँ करते दिखते हैं.जब अपनी ही रोटी बनानी भारी दिखे तो इनका क्या करें
मन होता है मुँह में दबा दें पाँच या दस के नोट.और कह दें.
जा! जा खा ले किसी दुकान से अपनी मन पसंद रोटी, गोश्त,कबाब ।
फिर भी इनकी रोटी निकलती है . चाहे अपनी एक रोटी कम करनी पड़े.
अब कुत्तों से ज़्यादा हमारे पूर्वज ,बंदर सड़कों पर घूमने लगे हैं . पूरा का पूरा कुनबा एक साथ चलता है. वो दिन दूर नहीं जब गाय,साँड़ कुत्तों की तरह बंदर भी सड़कों पर घूमते मिलें. बंदरों के आते ही हमारे तीनों पहरेदार उन्हें दौड़ा लेते हैं और फिर दिन भर चलता रहता है उनमें ज़ोर आज़माइश का दौर. ये बंदरों को पेड़ों या छतों से नीचे उतरने नहीं देते.
मन होता है मुँह में दबा दें पाँच या दस के नोट.और कह दें.
जा! जा खा ले किसी दुकान से अपनी मन पसंद रोटी, गोश्त,कबाब ।
फिर भी इनकी रोटी निकलती है . चाहे अपनी एक रोटी कम करनी पड़े.
अब कुत्तों से ज़्यादा हमारे पूर्वज ,बंदर सड़कों पर घूमने लगे हैं . पूरा का पूरा कुनबा एक साथ चलता है. वो दिन दूर नहीं जब गाय,साँड़ कुत्तों की तरह बंदर भी सड़कों पर घूमते मिलें. बंदरों के आते ही हमारे तीनों पहरेदार उन्हें दौड़ा लेते हैं और फिर दिन भर चलता रहता है उनमें ज़ोर आज़माइश का दौर. ये बंदरों को पेड़ों या छतों से नीचे उतरने नहीं देते.
अपने हिस्से की रोटी झपट लेने की लड़ाई इनमें चाहे होती हो पर दुश्मन भगाने में तीनों एकजुट हो जाते हैं.जहाँ एक भौंकते हुए दौड़ा तो बाक़ी दोनो भी उतनी ही तेज़ी से साथ हो लेते हैं. शक्ति प्रदर्शन में.
जानवरों की फ़ितरत हमेशा एक होती है.
इंसानों की मौक़े के हिसाब से बदलती रहती है.
इंसानों की मौक़े के हिसाब से बदलती रहती है.
#नूतन
2017-18
2017-18
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