ये है सुरक्षा चक्र हमारा


लखीमपुर में रक्षा बंधन का त्यौहार ज्यादा उत्साह से मनाया जाता है अपेक्षाकृत बनारस के । ऐसा मैंने महसूस किया।
छुटपन में तो ये समझ ही नहीं आता था कि भाई बहनों में प्रेम भी होता है।
क्योकि हर बात पे कटा-कटी के लिए तैयार। अम्मा से शिकायत। उनको ज्यादा मानती हैं,हमको कम। हमहीं को हर बात पे डांट पड़ती है। किसी भी खाने पीने की चीज़ पर निगाह लगाए रखना की बड़ा वाला हिस्सा हमें ही मिले।
यहाँ नया मुहावरा फिट बैठेगा।
-हर बात पे भारत-पकिस्तान हो जाना।
-हर बात पे भारत-चीन हो जाना। पर झगड़ा टेबल टॉक तक पहुचने के पहले ही सुलझ जाता था।
धीरे-धीरे संबंधों की डोर मजबूत होती जाती है।
चार बहन और एक भाई का परिवार। एक चचेरे भइया लिटिल भइया भी साथ रहते थे।
बचपन में राखी बांधने के बाद कुछ रूपये मिलेंगे ये पहले से पता रहता था। चार पांच जो भी रूपये मिलेंगे उसका क्या करेंगे ,शेख चिल्ली के हसीं सपनों की तरह वो भी मन ही मन तय रहता था।
पर ये क्या भइया राखी बंधवा के रुपये भी दे चुके होते थे ।लेकिन मुन्ना राखी बंधवाने को तैयार ही नहीं होते ।कहते इन लोगों को रूपये मिलेंगे हमें क्या मिलेगा। फिर किसी तरह बड़े मान मनउव्वल के बाद राखी बंधवाते थे।
लेकिन अब घर में किसी की भी ख़ुशी गम में मज़बूती से डटे रहते हैं। और हम महसूस करते हैं की हमारा सुरक्षा चक्र , रेशम के कच्चे धागों सा नहीं, फौलादी धागों सा मजबूत है।
22-23 साल से राखी अब डाक से ही भेजी जा रही। कभी नहीं भी पहुच पाये तो कोई मलाल नहीं।
1992 के बाद रक्षा बंधन पर एक नया रिश्ता जुड़ा उषा दीदी के साथ,बहुत सी यादें भी। फिर कभी विस्तार से।

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