इ हव बनारस
बनारसी फक्कड़ी
–-----------------
बात 2005 की है। हमने नई नई चौपहिया गाड़ी सेंट्रो लिया था।सो तय हुआ की सपरिवार बनारस भी घूम लिया जाय। बच्चे स्कूल में पढ़ते थे और हम पति पत्नी कॉलेज में पढ़ाते थे इसलिए गर्मी की इफरात छुट्टियां थी।
प्रोग्राम बना दुर्गाकुण्ड संकटमोचन होते हुए BHU विश्वनाथ मंदिर जाने का।
नई गाडी और दूसरे शहर का नम्बर देख कर कुछ दादा टाइप के लड़को ने गाड़ी रोक ली और कहने लगे SP का फरमान है आगे पीछे shinning वाले स्टीकर लगाने हैं और उसके कुछ पैसे देने होंगे।ऐसा करके वे लोग गाड़ी वालों से धन उगाही कर रहे थे।
एक तो जून की गर्मी दूसरे भरी सड़क पर रोक लिया। सब गाड़ी से उतरे ,कि देखें माज़रा क्या है।
हमारे पति देव ने अपनी तेज़ी दिखाते हुए उनसे कई सवाल दाग़ दिए।थोड़ी कहा सुनी के बाद कहा SP से हमारी बात करवावो। हमें स्टीकर नहीं लगवाना
इतना सुनते ही कहीं से उन लड़कों का नेता आ गया। और पूरा मसला जानने के बाद जो बोला तो उस घटना को सोच कर आज भी हंसी आ जाती है---
उसने कहा
"का रे सवन ,अदमी ना चिन्हैले का? जाये दे ई लोगन के।
और हम लोग आगे बढ़ गए।
–-----------------
बात 2005 की है। हमने नई नई चौपहिया गाड़ी सेंट्रो लिया था।सो तय हुआ की सपरिवार बनारस भी घूम लिया जाय। बच्चे स्कूल में पढ़ते थे और हम पति पत्नी कॉलेज में पढ़ाते थे इसलिए गर्मी की इफरात छुट्टियां थी।
प्रोग्राम बना दुर्गाकुण्ड संकटमोचन होते हुए BHU विश्वनाथ मंदिर जाने का।
नई गाडी और दूसरे शहर का नम्बर देख कर कुछ दादा टाइप के लड़को ने गाड़ी रोक ली और कहने लगे SP का फरमान है आगे पीछे shinning वाले स्टीकर लगाने हैं और उसके कुछ पैसे देने होंगे।ऐसा करके वे लोग गाड़ी वालों से धन उगाही कर रहे थे।
एक तो जून की गर्मी दूसरे भरी सड़क पर रोक लिया। सब गाड़ी से उतरे ,कि देखें माज़रा क्या है।
हमारे पति देव ने अपनी तेज़ी दिखाते हुए उनसे कई सवाल दाग़ दिए।थोड़ी कहा सुनी के बाद कहा SP से हमारी बात करवावो। हमें स्टीकर नहीं लगवाना
इतना सुनते ही कहीं से उन लड़कों का नेता आ गया। और पूरा मसला जानने के बाद जो बोला तो उस घटना को सोच कर आज भी हंसी आ जाती है---
उसने कहा
"का रे सवन ,अदमी ना चिन्हैले का? जाये दे ई लोगन के।
और हम लोग आगे बढ़ गए।
इ ह हमार बनारस।
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteका रे सवन ,अदमी ना चिन्हैले का?
ReplyDeleteजाये दे ई लोगन के।
पहिचनते ना ??
स्टाफ़ हैन !!
ये तो नहीं बोला था ??😃😃😃
ऐसे ही मुझे अपने जौनपुर में अपने पढ़ाई के समय की घटना याद आ रही है ।
हमारे मार्केटिंग के एक अध्यापक जो कि कम उम्र के थे,उनके साथ मेरे एक मित्र रोज़ बनारस से आते थे और साथ ही वापस जाए थे उस टाइम बस का किराया १० रुपए होता था, मेरा मित्र हमेशा अध्यापक के पीछे वाली सीट पर बैठता था, एक दिन मेरा मित्र किसी कारणवश नही आया तो उस दिन बस कंडक्टर ने मेरे teacher से केवल ५ रुपए ही लिए ५ रुपए लौटा दिए उनके पूछने पे बताया कि पहले ही दिन मेरे मित्र ने उसे समझा दिया था कि वो और मेरे अध्यापक स्टाफ़ है ( उन दिनो विद्यार्थी को स्टाफ़ बोला जाता था और उनसे आधा ही किराया लिया जाता था ) बहरहाल एबल दिन क्लास में मेरे मित्र को अध्यापक द्वारा बहुत डाँट पड़ी , लेकिन ये मेरे मित्र का बड़ा ही innovative और creative 😃😃 आईडिया था , साल भर फ़्री में बस सेवा लिया और उस पैसे ऐश किया ।।
ऐसे बनारसियो को शत शत नमन !!
जुगाड़ से बदे बड़े कम बन ही जाते हैं याद्गार घट्नायें मुस्कुराने का बहान दे ही जाती हैं। well written
Delete