गाँव की गलियाँ
कैम्पस में ही घर है सो,कालेज से घर ,घर से कालेज.
ये सामान्य रूटीन होता है मेरा
ऐसे में बहुत ज़रूरी काम न हो तो अमूमन मैं कई दिनों बाद सड़क तक जाती हूँ. और जब सड़क तक जाओ तो आती जाती सवारियों और सड़कों के इस्तेमाल के सबके तरीक़ों पर ध्यान जाना लाज़मी है.
हमने ये महसूस किया कि किसी व्यक्तिगत समस्या से ध्यान हटाना हो तो मेडिटेशन की जगह आप जाम में घुसकर देखिए आप भूल ही जाएँगे की इस चिल्ल-पों से भी बड़ी समस्या इस धरती पर होगी. तरह तरह के हॉर्न ऐसी स्वर लहरी पैदा करते हैं जिसका कोई जवाब नहीं.
ये सामान्य रूटीन होता है मेरा
ऐसे में बहुत ज़रूरी काम न हो तो अमूमन मैं कई दिनों बाद सड़क तक जाती हूँ. और जब सड़क तक जाओ तो आती जाती सवारियों और सड़कों के इस्तेमाल के सबके तरीक़ों पर ध्यान जाना लाज़मी है.
हमने ये महसूस किया कि किसी व्यक्तिगत समस्या से ध्यान हटाना हो तो मेडिटेशन की जगह आप जाम में घुसकर देखिए आप भूल ही जाएँगे की इस चिल्ल-पों से भी बड़ी समस्या इस धरती पर होगी. तरह तरह के हॉर्न ऐसी स्वर लहरी पैदा करते हैं जिसका कोई जवाब नहीं.
मुंबई और दिल्ली दो चार बार जाना हुआ. मैं सड़कों पर रेंगते वाहनों को देख के सोचने लगती कि बड़े शहरों के लोगों की आधी ज़िंदगी तो सड़कों के जाम में ही फँस के कट जाती है,थोड़ी देर को ख़ुश हो लेते कि इससे तो अपना लखीमपुर ही अच्छा है.
जहाँ बैलगाडी, भैसगाड़ी भी आजकल हम लोग देख पाते हैं। अगर इनकी कतारें देखनी है तो एक बार जाडे के मौसम में हरगांव (लखीमपुर सीतापुर के बीच स्थित कस्बा जहाँ चीनी मिल है) के आसपास से गुजरिये। गन्ने से लदी गाड़िया ,उस पर कम्बल लपेटे चुक्की-मुक्की लगाके बैठे किसान। कुहरे से भरी सड़कें धीरे धीरे रेंगती बैलगाड़ियाँ इस बात का एहसास कराती हैं कि भारत अभी भी कृषि प्रधान देश है।ये नज़ारे अक्सर दीख जाते हैं। महानगरों में जा के ये सब भूल जाता है।
लेकिन इधर कुछ नए ही अनुभव हुए. जैसे-
जहाँ बैलगाडी, भैसगाड़ी भी आजकल हम लोग देख पाते हैं। अगर इनकी कतारें देखनी है तो एक बार जाडे के मौसम में हरगांव (लखीमपुर सीतापुर के बीच स्थित कस्बा जहाँ चीनी मिल है) के आसपास से गुजरिये। गन्ने से लदी गाड़िया ,उस पर कम्बल लपेटे चुक्की-मुक्की लगाके बैठे किसान। कुहरे से भरी सड़कें धीरे धीरे रेंगती बैलगाड़ियाँ इस बात का एहसास कराती हैं कि भारत अभी भी कृषि प्रधान देश है।ये नज़ारे अक्सर दीख जाते हैं। महानगरों में जा के ये सब भूल जाता है।
लेकिन इधर कुछ नए ही अनुभव हुए. जैसे-
कुछ दिनों पहले सरकारी स्तर पर शिक्षण संस्थानों में सरकारी निर्देश पर यातायात जागरूकता सप्ताह मनाया गया. जिसका लब्बो लूवाब ये रहा कि दुपहिया चालक हेल्मेट लगायें और चौपहिया चालक सीटबेल्ट. इन्ही दो बातों पर ज़्यादा बल दिया गया.
“बायें चलें “बताया ही नहीं जाता, क्योंकि सबको पता है अपनी सुविधानुसार चलें.
“बायें चलें “बताया ही नहीं जाता, क्योंकि सबको पता है अपनी सुविधानुसार चलें.
सड़कों की बात करें तो, गड्ढा मुक्त सड़क कब गड्ढा युक्त हो जाती है ये ज़ोरदार हचके लगने पर अहसास होता है।
अब देखिए इलाहाबाद से बनारस जाते हुए जीटी रोड पर आप शेरशाह को याद करते हुए , कलकत्ता से पेशावर की बात करते हुए फ़ोरलेन या सिक्सलेन सड़क पर सौ की रफ़्तार से गाड़ी चला रहे हैं अचानक उलटी तरफ़ से कोई गाड़ी आपके सामने आती दिख सकती है। आप को अपनी ड्राइविंग का कमाल दिखाना होगा. वरना राम-नाम सत्य होते देर नहीं लगेगी. दूसरे आप सतर्क रहें. गड्ढे स्वर्णिम चतुर्भुज वाली सड़क पर भी मिल सकते हैं.
चलते-चलते दूर से ही टोलगेट चमकने लगे आप रुपए निकाल लें. यहाँ आपको एक छोटी झपकी लेने का टाइम मिल सकता है. बोर्ड भी दिख सकता है -“दुर्घटना से देर भली” अगर जल्दबाज़ी में हैं तो बड़बड़ाइए, अगला गुनगुनाता मिलेगा। आप जैसे हज़ारों को वो फ़ेस करता है, डेली के डेली, मुँह में गुटका दबाए, कम्प्यूटर चलाते.
शहर नज़दीक आ गया आपके। शहरों में घुसते ही जगह-जगह ओवरब्रिज के लिए खुदी सड़कें डाइवरजन के नियमों के साथ आपके स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए मिलेंगी।
शहर की बातों से अलग अब गाँवों का रूख करें
अब देखिए इलाहाबाद से बनारस जाते हुए जीटी रोड पर आप शेरशाह को याद करते हुए , कलकत्ता से पेशावर की बात करते हुए फ़ोरलेन या सिक्सलेन सड़क पर सौ की रफ़्तार से गाड़ी चला रहे हैं अचानक उलटी तरफ़ से कोई गाड़ी आपके सामने आती दिख सकती है। आप को अपनी ड्राइविंग का कमाल दिखाना होगा. वरना राम-नाम सत्य होते देर नहीं लगेगी. दूसरे आप सतर्क रहें. गड्ढे स्वर्णिम चतुर्भुज वाली सड़क पर भी मिल सकते हैं.
चलते-चलते दूर से ही टोलगेट चमकने लगे आप रुपए निकाल लें. यहाँ आपको एक छोटी झपकी लेने का टाइम मिल सकता है. बोर्ड भी दिख सकता है -“दुर्घटना से देर भली” अगर जल्दबाज़ी में हैं तो बड़बड़ाइए, अगला गुनगुनाता मिलेगा। आप जैसे हज़ारों को वो फ़ेस करता है, डेली के डेली, मुँह में गुटका दबाए, कम्प्यूटर चलाते.
शहर नज़दीक आ गया आपके। शहरों में घुसते ही जगह-जगह ओवरब्रिज के लिए खुदी सड़कें डाइवरजन के नियमों के साथ आपके स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए मिलेंगी।
शहर की बातों से अलग अब गाँवों का रूख करें
बहुत दिनों बाद गाँव जाने को मिला और चार पाँच दिन रहने को. मालूम है क्या देखा??
बिलकुल टटके अनुभव हुए। हमें सफ़र, सवारी , दोपहिया, चौपहिया से जुड़े सारे चुटकुलों के साक्षात दर्शन हो गए.
पहली बात,। गाँव के लोग जितनी जाँबाज़ी से बाइक चलाते हैं शहर के लोग उतना तमाशे में देखते हैं, और हेलमेट? दूर दूर तक नहीं.
दूसरी बात, शहर में ट्रिप्लिंग पर चालान कट जाता है जबकि गाँवो में तीन सवारी से कम पर बाइक स्टार्ट ही नहीं की जाती,
तीसरे, शहरों में जितना सामान हम आटो और रिक्शों में लादकर लाते हैं गाँवों में उतना सामान बाइक पर लाते हैं.
बड़े-बूढ़े बड़बड़ाएँ तो बड़बड़ाते रहें —
ज्जा जा रे ज़माना
अब ज़रा गाँवों के पास के बाज़ारों से गुज़रिए.
ट्रैफ़िक, यातायात, सिग्नल, पुलिस, भूल ही जाइए सोशल पुलिसिंग के हाथ में सारा कंट्रोल.
सहालक में भीड़ कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती है ।बिक्री बढ़ाने के लालच में दुकान का सारा सामान दुकान के बाहर ही सज़ा लेता है दुकानदार. परात से लेकर मउर तक सब सड़क पर हाज़िर.
समोसे-पकौड़ी की दुकान इस तरह से बढ़कर लगाई जाती है कि आप कार से हाथ निकालें तो सीधा कड़ाही से पकौड़ी निकाल सकते हैं,. और जहाँ से हम कार पार करने में भी भुनभुनायें वहाँ वो ट्रक तक क्रॉस करवा देते हैं. बीस फ़ीट की सड़क ५ फ़ीट की गली दिखती है
हर शख़्स डायरेक्शन देता मिलेगा-
डिग अ, डिग अ डिगअ, निकल जाई निकल जाई
बिलकुल टटके अनुभव हुए। हमें सफ़र, सवारी , दोपहिया, चौपहिया से जुड़े सारे चुटकुलों के साक्षात दर्शन हो गए.
पहली बात,। गाँव के लोग जितनी जाँबाज़ी से बाइक चलाते हैं शहर के लोग उतना तमाशे में देखते हैं, और हेलमेट? दूर दूर तक नहीं.
दूसरी बात, शहर में ट्रिप्लिंग पर चालान कट जाता है जबकि गाँवो में तीन सवारी से कम पर बाइक स्टार्ट ही नहीं की जाती,
तीसरे, शहरों में जितना सामान हम आटो और रिक्शों में लादकर लाते हैं गाँवों में उतना सामान बाइक पर लाते हैं.
बड़े-बूढ़े बड़बड़ाएँ तो बड़बड़ाते रहें —
ज्जा जा रे ज़माना
अब ज़रा गाँवों के पास के बाज़ारों से गुज़रिए.
ट्रैफ़िक, यातायात, सिग्नल, पुलिस, भूल ही जाइए सोशल पुलिसिंग के हाथ में सारा कंट्रोल.
सहालक में भीड़ कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती है ।बिक्री बढ़ाने के लालच में दुकान का सारा सामान दुकान के बाहर ही सज़ा लेता है दुकानदार. परात से लेकर मउर तक सब सड़क पर हाज़िर.
समोसे-पकौड़ी की दुकान इस तरह से बढ़कर लगाई जाती है कि आप कार से हाथ निकालें तो सीधा कड़ाही से पकौड़ी निकाल सकते हैं,. और जहाँ से हम कार पार करने में भी भुनभुनायें वहाँ वो ट्रक तक क्रॉस करवा देते हैं. बीस फ़ीट की सड़क ५ फ़ीट की गली दिखती है
हर शख़्स डायरेक्शन देता मिलेगा-
डिग अ, डिग अ डिगअ, निकल जाई निकल जाई
निकलना हमारी मज़बूरी है.आप निकलिए. शर्तिया गाड़ी को खरोंच लगेगा. साइड का शीशा विशा भी टूट सकता है. आप गाड़ी की खरोंच देखिए,हमारे भाई लोग तो हर सूरत में मुस्कुराते मिलेंगे. ऊपर से सड़क पर खड़े किसी के ठेले परआपकी गाड़ी से ज़रा धक्का क्या लगा - तीन पुश्ततक की गालियाँ तोहफ़े में मिल गयीं. शीशा चढ़ाए रहें तो ज़्यादा सही .
ना सुनो न बुरा लगे.
“ले आओ लंबोगिनी देखें कैसे चलती है हमारी सड़कों पर”। शहरों से आती गाड़ियों की नफ़ासत को यहाँ ऐसे ही मज़ाक़िया अन्दाज़ में देखा जाता है.
ना सुनो न बुरा लगे.
“ले आओ लंबोगिनी देखें कैसे चलती है हमारी सड़कों पर”। शहरों से आती गाड़ियों की नफ़ासत को यहाँ ऐसे ही मज़ाक़िया अन्दाज़ में देखा जाता है.
और सबसे अंतिम बात जिस पर हम मुस्कुराते हैं वो ये कि आप चाहे जिस भी चौपहिया से जाएँ कुछ लोग यही कहते मिलेंगे—
फलाने,मारुति से आए हैं
(उनके लिए ठंडा मतलब कोकाकोला की तरह ही
चौपहिया मतलब मारुति)
“PS: पूरबिहा भाषा में डिगअ" शब्द "ठीक ह" को बेफ़िक्री से बोलने पर निकलता है।
फलाने,मारुति से आए हैं
(उनके लिए ठंडा मतलब कोकाकोला की तरह ही
चौपहिया मतलब मारुति)
“PS: पूरबिहा भाषा में डिगअ" शब्द "ठीक ह" को बेफ़िक्री से बोलने पर निकलता है।
#गाँव की गलियाँ
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ReplyDeleteNicely written
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