सब रंगों से है रंगीला,रंग बसंती!!


दरवाज़े पर मिनी बस आ गई . आसपास के घरों में चहल -पहल. चलो पिक्चर देखने चलना है. जल्दी तैयार हो जाओ. जल्दी भाई जल्दी.
तैयार हो रही हूँ, कौन सी पिक्चर?
पूछो न. जिसको चलना है, तैयार हो जाओ.बस.
ये फ़रमान थे ,दरोग़ा* चाचा के.जो हमारे पड़ोस के सरकारी मकान में रहते थे.
जिसक चलना हो???
जिसको का क्या मतलब!
तब  कस्बों में टी०वी० तो थी नहीं. सिनेमा ,सिनेमाहाल में ही देखना था. वो भी कभी कभी. तो? तो सभी तैयार.
हम तीन घरों के लोग फटाफट तैयार होकर मिनी बस में बैठ गए. बग़ल वाली चाची ने पूछा कौन सी पिक्चर देखने चल रहे हैं हम लोग. एक साथ कई आवाज़ आइ नहीं पता. साथ में हँसी का फ़व्वारा.
चाचा ने कह दिया तो घूमने जाना है, अपने ओहदे का जलवा रखते थे .चाहे रामलीला देखनी हो ,प्रवचन सुनना हो , स्थानीय मेला देखना हो या काली जी के मंदिर पर होने वाली कथा . सब तैयार रहते.
बस में बैठ गए .1982-83 की बात थी. बस वाले ने गाड़ी स्टार्ट की . गाना बजने लगा कानफोड़ू आवाज़ में
 “ जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुंजार”” पिक्चर का पता नहीं . और हम लोगों का पोर-पोर बसंती हुआ जा रहा था,कि घूमने, सिनेमा देखने जा रहे.
नया नया सिनेमहाल था . फट्टा सिनेमाहाल टाइप. फ़र्स्ट क्लास और सेकंड क्लास . बड़ा सा हाल. लाइट चली गई तो इंतज़ार करो . फ़र्स्ट क्लास थोड़ी दूछत्ती जैसी बनी थी. हम लोग विशेष दर्शक थे. सो फ़र्स्ट क्लास में बैठे. चाचा ने ऑपरेटर से कहा अब शुरू करो. सिनेमा शुरू हुआ
थोड़ी देर में हम सबने पढ़ते हुए ज़ोर से कहा ‘
‘राजा और रंक’ हमम्म.तो ये है पिक्चर.
पिक्चर तो बहुत अच्छी नहीं लगी, लेकिन गाने !एक से एक. जब सुने तो यही लगा कि ये इसी पिक्चर के हैं?? बेहद अच्छे गीत.सभी पहले से सुने हुए .
-मेरा नाम है चमेली मैं हूँ मालन अल्बेली..
-तू कितनी अच्छी है तू कितनी भोली है,
कितनी प्यारी है ओ माँ,ओ माँ.
-ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना...
-संग बसंती,अंग वसंती, रंग वसंती छा गया मस्ताना मौसम आ गया......
और भी दो तीन गाने.
वापसी में एक ने गाना शुरू किया
‘ओ फिरकी वाली ,
तू कल फिर आना ,
नहीं फिर जाना... ‘
फिर क्या था ,ड्राइवर से लेकर मिनी बस की सभी सवारियाँ वासंती उमंग से वही गीत गुनगुना रही थीं. ओ फिरकी वाली......डडडडडड
आज सोच के ही रंग वसंती,अंग वसंती हुआ जा रहा.
ये बात है ‘चकिया’की तब बनारस जिले की चार तहसीलों (बनारस, ज्ञानपुर, चंदौली, चकिया) में से एक तहसील थी.18वीं शताब्दी में बनारस ज़मीन्दारी का हिस्सा थी। वहाँ के जीआईसी से हमने ग्यारहवीं - बारहवीं जमात की पढ़ाई की.
दरोग़ा * विलुप्त हो गई खितानी भाषा का शब्द है जो  मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ अपने देश में आया था.

बसन्त पन्चमी २०१८

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