बस यूँ ही

धारा प्रवाह बोलना एक कला है ये कला बहुतों में नहीं होती .कोई बीच में अचानक टोक दे,रोक दे तो प्रवाह रुक जाता है . मैंने इमर्जेंसी के बाद हुए इलेक्शन के समय पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी को एक चुनावी सभा में बोलते सुना था, धाराप्रवाह .तब इतनी ही समझ थी कि भाषण सिर्फ़ नेता ही देते हैं .उसके बाद से धाराप्रवाह शब्द के साथ ही दिमाग़ में अटल जी की छवि घूम जाती है.
अब तो पाँच में से एक वक़्ता और 10 में से एक लेखक है . हमारी तरह बहुत से लोग गर्दा उड़ा रहे हैं। स्रोता और पाठक बहुत कम.
उसी तरह है बिना रुके लिखना. मन में आते हुए विचारों को पन्ने पे उतारना .ये कार्य भी बिना रोक-टोक के ही किया जाता है. पर जब बात फ़ेसबुक या ऑनलाइन लिखने की हो तब तो और भी मुश्किल.
हम जैसे लोग जो नई तकनीकी को बहुत जल्दी नहीं समझ पाते हों, तभी लिख पाते हैं जब अपनी तलवार को अपने हिसाब से ढाल लेते हैं. हालाँकि नई तकनीकी को सीखना मुझे अच्छा लगता है.
ऐसे में हमें नई पीढ़ी पर गर्व है.चकित होती हूँ, छोटे छोटे बच्चे भी कितनी जल्दी समझ जाते हैं.
असल बात अब.
दुखवा का से कहूँ,
हमारे मोबाइल ने हाथ खड़े कर दिए, हैंग होने लगा. इशारा किया अब नहीं चला जाता.
मोबाइल बदल दिया.धारा रुक गई ।जब तक इस नए मोबाइल की आदत न बन जाय.
सिम पुराना है पर कई सारे नम्बर ग़ायब हो गए हैं।अब ये डायल करने पर पता चलेगा किसका नम्बर सिम ने सम्भाल के रखा है और कौन लापता।जो भी हो ,एक नज़र में ये अन्दाज़ लग रहा है कि पुराने रिश्तों को सिम ने सहेज के रखा है. नये नम्बर ही ग़ायब हैं
#बस यूँ ही

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