शंकर भगवान् ,सावन और बेलपत्र


अधिकतर शांत रहने वाले हमारे कैंपस में, जो तरह तरह के पेड़ पौधों से भरा हुआ है, बाज दफे चहल पहल बढ़ जाती है। बच्चे बूढ़े जवान महिलाएं पुरुष,सभी दिखने लगते हैं।
वजह??? सावन और बेलपत्र की दरकार।
यहां पहले बेल का एक पेड़ था धीरे धीरे कई तैयार हो गए हैं। रविवार की शाम बेलपत्र लेने वालों की ऐसी भीड़ जुटती है की क्या बताएं।कोई 11 कोई 21 कोई झोला भर के ले जाता है और कोई तो पूरी डाली ही तोड़ ले जाता है,रास्ते में काँटे हम लोगों के लिए छोड़ जाते हैं।
कुछ खुद भगवान को चढाने के लिए तो ले ही जाते हैं कुछ बेचने वाले भी ले जाते हैं। मैं अपनी बालकनी में बैठे-बैठे लोगों की तरह तरह की गतिविधियों का आनंद लेती रहती हूँ।
छुटपन में कभी-कभी मैं भी अम्मा के प्रदोस व्रत वाले दिन बेलपत्र लेने जाती थी।साफ़ बिना दाग वाली बिना कटी फटी तीन पत्तियो से जुड़ी बेल की11 पत्तियां ले आती थी।
।।सोचती हूँ!शंकर भगवन बेलपत्र चढ़ने से कितने खुश होते हैं,मालूम नहीं।हमारे धर्मशास्त्रों में बेलपत्र चढाने की बात क्यों कही गई,उसके पीछे क्या लॉजिक है,मालूम् नहीं।पर रक्षा बंधन आते आते पेड़ जरूर पत्तियों से खाली हो जाता है ।न जाने कैसे अपने को जिन्दा रख पाता है पत्तियों के बिना ।और फिर से तैयार होता है अगले सावन के लिए हरा भरा होने को।
आज सोमवार है। इसलिए शांत कैंपस का दृश्य हमारी बालकनी से।
24जुलाई 2017


Comments

Popular posts from this blog

NEP 2020 और महाविद्यालय परिसर

लखनिया दरी और चुनार के यात्रा संस्मरण

आइस पाइस