पर्यावरण

1-हमारे छोटे कदम
कुछ समय पहले हमारे घर एक धार्मिक अनुष्ठान हुआ .पूजापाठ के बाद बची पूजन सामग्री के विसर्जन की बात आयी. पंडित जी ने कहा इसे उल्ल नदी या किसी नदी में प्रवाहित कर दीजिए.यह नदी लखीमपुर की बरसाती नदी है.
प्रवाहित की जाने वाली चीज़ों में कुछ फूल पत्ते थे और कुछ अनाज.
हमने कहा नदियां चाहे जितनी गंदी हों , हम ये सामान नदियों में नहीं डालेंगे.
-फिर हमने फूल पत्तियों को अनाज से अलग किया और पार्क के कोने में छोटा गड्ढा करके उसमें दबा दिया.
-मिली जुली दालें और चावल को हमने गाय को खिला दिया.
-हवन की राख गमलों में डाल दिया.
मन को संतुष्टि रही कुछ अच्छा ही किया.
शायद आप भी ऐसा करते हों!!
अगर नहीं तो अब से करिएगा.


2-हम नहीं सुधरेंगे

स्वच्छता अभियान का नारा देने वाले,रैली निकालने वाले ,एक दल के लोग chairman पद के प्रत्याशी के प्रचार के लिए हमारे मुहल्ले में जनसंपर्क कर रहे थे .साथ ही उनमें से कुछ लोग पोस्ट कार्ड साइज़ के स्टिकर जगह जगह चिपका रहे थे.
जिस काग़ज़ पर से स्टिकर उखाड़ रहे थे, उसे जहाँ तहाँ फेंकते जा रहे थे. बिलकुल गंदगी से बेपरवाह. एक तो सड़क गंदी कर रहे थे,दूसरे दीवालों की सूरत भी बिगाड़ रहे थे.
जाने उनके चुनावी वादे क्या हैं.
# पंचायती राज
# हम लाए हैं तूफ़ाँ से कश्ती निकाल के


3-पर्यावरण को प्रदूषित करती पर्यावरण परीक्षा.
इस बात को ले के सारी कायनात लग गई है कि कैसे अपने पर्यावरण को बचाया जाय। तरह तरह के प्रयास हो रहे कोई पेड़ लगा रहा कोई , कोई सोलर सिस्टम , कोई पानी बचा रहा है तो कोई बिजली, पोलोथीन के प्रयोग कम किए जा रहे और अनेकानेक प्रयास।
पर्यावरण हित में जागरूकता फैलाने हेतु छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर द्वारा ‘पर्यावरण अध्ययन ‘ विषय शुरू किया गया. नियम ये है कि स्नातक में आपको एक बार पर्यावरण अध्ययन की परीक्षा पास करनी होगी.यदि तीन वर्षों में भी ये परीक्षा पास नहीं कर पाए तो अन्य विषयों में पास होने के बावजूद आपका परीक्षाफल अपूर्ण माना जाएगा।
लगभग सत्रह वर्ष पहले शुरू हुए इस विषय में पहले यह तय हुआ की 75% अंक का असाइंनमेंट जमा करना होगा । और 25 % अंको की लिखित परीक्षा पास करनी थी.
समस्या यह कि महाविद्यालय स्तर पर लगभग 1700 छात्र छात्राओं के प्रोजेक्ट फ़ाइल को कैसे जाँचा परखा जाय? कौन जाँचेगा? पारिश्रमिक क्या होगा? वग़ैरह वग़ैरह।
नया तरीक़ा या तोड़ ये निकाला गया कि ओ॰एम॰आर॰ आधारित परीक्षा करायी जाय।
इस साल यानि 2019 में हमारे कालेज को चैलेंज मिला लगभग चार हज़ार छात्रों की पर्यावरण परीक्षा का ।महाविद्यालय ने चैलेज लिया और सफल भी रहा।
किंतु उक्त बातों की भूमिका के पीछे हम ये कहना चाहते हैं कि पर्यावरण जागरुकता के ये तरीक़े ठीक नहीं।जिनसे टनों काग़ज़ बरबाद हो रहा है जबकि जागरुकता सिफ़र है। हमें इन तरीक़ों को बदलने पर विचार करना चाहिए।
हमारे कालेज में पर्यावरण परीक्षा की तैयारियों का दृश्य।
17/03/2019
Lakhimpur Kheri

4- ध्वनि एवम वायु प्रदूषण
 हम सभी जानते हैं कि एक निश्चित सीमा से अधिक की ध्वनि शोर मानी जाती है । बावजूद इसके हम उसमें कमी नहीं करते। चाहे अनावश्यक हार्न बजाना , बम पटाखे फोड़ना,जेनरेटर चलाना, बेवजह पेट्रोल फूँकना, लाउडस्पीकर बजाना इत्यादि।
और अगर किसी धर्म से जुड़ी बात कर दीजिए तो दूसरे तो दूसरे अपने धर्म वाले भी नाराज़ हो जाएँगे।
कहेंगे
“अब हम क्या पटाखे भी न छुड़ायें। आप उनको नहीं रोकते” अब ध्वनि और वायु प्रदूषित होता है तो हो।
इसी तरह किसी आयोजन में अपने देश में खुले आम लाउड स्पीकर चला कर , धमाधम डी जे बजाकर जश्न मनाया जाता है। “डी जे वाले बाबू जरा...। आपका दिल बैठता है बैठे , धड़कन बढ़ती है बढ़े, आप बहरे हों ,आपकी बला से।
कुछ साल पहले की बात है जब पीछे पार्क बन रहा था तो एक आयोजन में पूरी रात “तमंचे पे डिस्को “ हुआ और दो दो जेनरेटर धुआँ और शोर के साथ चलते रहे । सारा शोर हमारे हवा महल (घर) में आता रहा।शोर और धुएँकी वजह से सिर दर्द हो गया। सम्बंधित अधिकारियों से शिकायत करने पर वाजिब संज्ञान भी नहीं लिया गया।
पर देश बदल रहा है , हम बदल रहे हैं ,नई टेक्नोलोजी आ रही है। और सरकारें नियमों और क़ानूनों से मानवजाति के क्रियाकलापों को प्रतिबंधित कर रही है। ताकि वनस्पतियाँ और जीवधारी सुकून से रह सकें, जी सकें।
हमारा पर्यावरण मंत्रालय नई दिल्ली तथा NGT अर्थात नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर्यावरण संरक्षण एवं वन संरक्षण की दिशा में सक्रिय है।
किंतु कोई भी प्रयास तब तक सार्थक एवं सफल नहीं होगा , जब तक कि उसमें मनुष्य जाति का सहयोग न मिलेगा, हम अपनी बिगड़ी आदतों को नहीं छोड़ेंगे।

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