Good touch, Bad touch,

गर्मी की छुट्टियों में हम नानी के घर नहीं जाते थे, बल्कि अपने गाँव जाते थे।कभी परीक्षा ख़त्म होने के बाद,कभी 20 मई को रिजल्ट आने के बाद।
गांव में तब बिजली थी नहीं, तो सोने के लिए 7-8 साल तक के घर के सभी बच्चों की बंसखट घर के दरवाजे पर शाम से ही बिछ जाती। साथ में आखिरी में बाबा की चारपाई। सहन बड़ा था सो थोड़ी दूर पे बड़के बाबूजी ,फिर थोड़ी और दूर पे छोटके बाबूजी की चारपाई बिछती थी।
बगल के घर के दरवाजे पर केदार भइया अपने बाल बच्चों के साथ।
घर के बगल से ही दूसरे गाँव को जाने वाले रस्ते पर इक्का-दुक्का राहगीर देर रात तक आते जाते थे।
हमारे घर ही नहीं सभी के घर बच्चे (लड़के लड़कियां) और पुरुष बाहर ही सोते थे।
बच्चों की जमात आपस में कहानियां कहती, बुझउव्वल बूझती-बुझाती,सियार की हुआँ हुआ सुनती,बाबा से डाँट खाती सो जाती थी।
डकैती की घटनाएँ होने पर सब घर की छत पर सोने लगे।
कभी दिमाग में ही नहीं आया ,
Good touch,
Bad touch,
स्कूल आते जाते कितने ही सूनसान रस्तों से गुजरे,
कभी -कभी डर भी लगा,
पर मुन्नी लाल चुन्नी की पढ़ी कहानी के भेड़िये जैसा ही डर रहा।
अफ़सोस अब भेड़ियों की अनेक शक्लें हो गई हैं।
आखिर बच्चों को कितनी जल्दी बड़ा कर दिया जाय।
क्या कुछ समझा दिया जाय,

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