Recharg करिए ख़ुद को

जंगल जंगल बात चली है पता चला है
चड्ढी पहन के फूल खिला है फूल खिला है।
बच्चों का चड्ढी मार्च। आज की फ़िल्म "चिल्लर पार्टी"  में कुछ ऐसा ही नज़ारा था।
क्या एक्टिंग की है बच्चों ने।शानदार।

स्टार गोल्ड सेलेक्ट पर इधर कई अच्छी फिल्में देखने को मिली। जैसे मुम्बई की लाइफ पर बनी धोबीघाट, अनारकली ऑफ़ आरा,जेड प्लस।और आज चिल्लर पार्टी।

क्या तो समय आ गया है। बच्चों के लिए भी एक से बढ़ के एक फ़िल्म।
स्टेनली का डिब्बा हो या तारे जमीं पर। नार्निया हो या लिटिल स्टुअर्ट। आई ऍम कलाम या फिर मकड़ी। सब की सब मज़ेदार।बार बार देखने पर भी मन न ऊबे।जिसमे अमोल गुप्ते की फ़िल्म तारे जमीं पर और स्टेनली का डिब्बा लाजवाब है। बालमन के विभिन्न पहलुओं को दिखाती ये फिल्में मन में गहरी पैठ बनाती हैं। पेरेंटिंग के लिहाज से भी अच्छी हैं।
एक हम लोगों का समय था। भक्त प्रह्लाद,बालक ध्रुव....हूँह....बीच में ही नीद आ जाय। इनसे अच्छा तो बाइस्कोप देखना लगता था। एक डिब्बे में चार बच्चे एक साथ घूमती तस्वीरें देख के खुश हो लेते थे।

जब मन थोडा अनमना हो,तो रिचार्ज करिये, फ़िल्म देखिये।ये भी एक थेरेपी है। नुस्खा नया नहीं है।लेकिन  हम भी बताये दे रहे हैं।


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