आइस पाइस
वही खेल
वही खेल का मैदान
क्रिकेट,बैड्मिंटन,
फ़ुट्बॉल, आइस-पाइस,
फ़ुट्बॉल, आइस-पाइस,
झगड़े -सुलह, कुट्टी-मीट्ठी,
बीच बीच में सुस्ताना
फिर नए खेल की योजना बनाना,
टॉस के लिए सिक्के कहाँ
कोई टुकड़ा काग़ज़ का उछाल देना,
कोई टुकड़ा काग़ज़ का उछाल देना,
गेंद का झाड़ी में अटकना,
दलदल में जाना ,
दलदल में जाना ,
वो घुस के कीचड़ में किसी जाँबाज़ लड़के का
जा के गेंद निकालना
कभी रखना तेल के जलते दिये
कभी दामन को भर देना रंगों की फ़ुहारों से
कभी रखना तेल के जलते दिये
कभी दामन को भर देना रंगों की फ़ुहारों से
कुछ भी तो नहीं बदला है
कभी देखा है ?
फिर से ग़ौर किया है?
भरी दोपहरी
भरी दोपहरी
कनेर की शाख़ों पर
आसमान को छू लेने का रोमांच ,
हो-हल्ला करते हुए अचानक तेज़ दौड़ लगाना
ये भी करते हैं,वो भी करते थे
बदले हैं तो बस चेहरे और नाम .
ये भी करते हैं,वो भी करते थे
बदले हैं तो बस चेहरे और नाम .
इस अहाते में खेलते हुए दूसरी पीढ़ी आ चुकी है.
छोड़ के अपने खेल के मैदान एक पीढ़ी जा चुकी है ,
अनजान टेढ़े-मेढ़े रस्तों पर
बुलाता है बार- बार उन्हें ये मैदान ।
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
ReplyDeleteभले छीन ली मुझसे मेरी जवानी ,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती,वो बारिशका पानी।
बहुत ही बढ़िया लिखा दीदी आपने, बिलकुल बचपन की याद दिला दिया ।
वो दिन , वो खेल , वो खेल के मनचाहे नियम, वो बातें, वो शरारते और उस पर से अच्छा �� बने रहने की चाहत सभी अपने में बेजोड़ थी ।।
आज भी जब जगह पर जाता हु जहाँ बचपन बीता , एक अजीब सी ख़ुशी व बचपन के साथियों का उसी तरह से न रहना एक कसक सा महसूस कराता है ।
अब सच में इस बात की समझ आ गई कि क्यों कहा गया है “Old is Gold”.
वाह humble sun
ReplyDeleteवाह . Thankyyou for so touching comments
आदाब अर्ज़ है !!
Deleteउस समय के कुछ खेलो का उच्चारण भी सबका अलग होता था ।
ReplyDeleteजैसे मुझे याद है हम कक्षा ३ या ४ में एक खेल खेलते थे ‘बीस अमरीत ‘ बड़े प्यार से हम खेलते थे ।एक दिन स्कूल में कोई नई लड़की आइ बोली इसको ‘विष अमृत’बोलते है , क़सम से चार पाँच दिन तो केवल उच्चारण ठीक करने में गए और खेल का मज़ा भी जाता रहा सही नाम लेने में ।
वैसे ही आईस पाईस हम सबका सबसे पसंदीदा खेल होता था, इसके अपने भी कई क़िस्से होते थे , अभी कुछ साल पहले मेरी बेटी ने मुझे टोका कि इस खेल को English में ‘I Spy’ कहते है और हिंदी में छुपनछुपाई कहते है ।।
पर सच तो यही जो मज़ा ‘आईस पाईस ‘का है वो कही नही है ।।
लेख से उम्दा कमेंट है
DeleteThis comment has been removed by the author.
Deleteधन्यवाद ..
ReplyDeleteऐसे ही प्रोत्साहित करते रहिए,
ब्लगवा बड़ा शांत सा रहता है, समझै नहीं आता कि कौनो पढ़ते भी है की नहीं ??
पढ़ते हैं सब लिखना नहीं आता सबको । पढ़ने के बाद ही कमेंट फ़ेस्बुक पर कर देते हैं
Delete