खेल बचपन के

एक खेल था बचपन का ।इसमें से कई शब्द बिना अर्थ के ही हैं  पर बचपन की यादों में शुमार हैं.
कितनों के??


ओक्का बोक्का ,तीन चलोक्का
लइया लाची ,चंनन काटी
चंनना में का बा ?
इजइल  बिजइल
पान- फूल
ढोढ़वा पचक ।

हालाँकि बहुत ज़ोर देने पर ही एक दो बिम्ब याद आ रहे हैं कि कैसे दो से अधिक बच्चे और एक लीडर मिल के मज़े लेते थे।
पचक्क!!! बोलने के साथ कोई बच्चा हँसी ठिठोली में  हथेली को केकड़े की तरह खड़ा ही रखता था तो फिर ठोंक के उसको पचकाया जाता था। पचक्क!पचक्क और इस बीच  खिलखिलाती हँसी फूट जाती थी.

फिर
जब सबकी हथेली पचक जाती तो  लीडर अपनी हथेली जमीन पर रखता और उसके बाद  बच्चे  एक एक करके अपनी अपनी हथेलियां एक के उपर एक जमा देते और एक तुकबन्दी  बोली जाती समवेत स्वर में--
ताई ताई पुड़िया, घी में चभोरिया
हम खायें कि भौजी खायं
भउजी सतरंगिया॥॥
और ग्रुप लीडर हथेली के पीछे की चमड़ी बड़े प्यार से चुट्कियों से पकड़ कर एक सिर पर और दूसरी कमर पर रखता जाता। अब सब बच्चे नदी में नहाने, डुबकी लगाने की  एक्टिंग करते। वापसी में मुट्ठी बाँध कर आते और फिर से घेरे में बैठ जाते।
अब ग्रुप लीडर बच्चे का हाथ पकड़ कर पूछ्ता - तोहरे मुट्ठी में का बा?बच्चा बोलता- पूड़ी, मिठाई.....फिर पूछते तू खईबा कि सबके देबा? बच्चे के सबके बोलने पर
थोड़ी थोड़ी सब्को बाँटी जाती और बची भगवान के लिये आसमान में  उछाल दी जाती।
कुछ ब्च्चे कह्ते  बची हम खायेंगे तो हथेली उसकी मुँह की ओर उछाल दी जाती।
खेल खतम हो जाता।
योजना बनती दूसरे खेल की।
अगर  बरसात का दिन है तो "गुट्टक"  जिसे  हम अपनी भाषा में "गोंटी’ कहते शुरु हो जाती।  इस्में भी कई तरह से खेलते थे।
एक सिर्फ़ पाँच गुट्टक से खेलते एक्कम दो तिक्का चुउआ पन्जा,रैया कैन्ची कुत्ता कोठरी सरपोट्टा
दूसरा- ढेर सारी गोंटी  से खेला जाता था । इसे हमने अपनी अम्मा और चाची को खेलते देखा है।
अगला खेल- रस्सी कूदने का होता। वो भी कई तरीके से । अकेले या ग्रुप में भी होता था।
लुका  छिपी, उँच नीच, सोनपरी, विष अमॄत,


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