लखनिया दरी और चुनार के यात्रा संस्मरण

लखनिया ट्रिप
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नदी किनारे की बसावट ने बनारस की महत्ता को बढ़ा दिया। व्यापार पनपे। शहरीकरण होता गया। अंगेरजों के समय में प्रशासनिक मुख्यालय बना।
यहाँ की ख्याति ज़री के काम बनारसी साड़ी और बनारसी पान के लिए रही।
तीर्थ और ज्योतिर्लिंग, महाशमशान , मुक्तिधाम इत्यादि विशेषताओं के कारण शहर की बसावट घनी और विस्तृत होती गई। यहाँ के लोग सुबह उठकर गंगा स्नान पूजा पाठ तीर्थ की परिक्रमा और दान पुण्य में रमने लगे। अनेकों कला संस्कृतियों को पालने पोसने लगा ये शहर बनारस। 
माला फेरने और बुतखानों से मन भरा तो लोग पंचकोशी परिक्रमा करते, तीज त्योहार और सावन के मेले लगते। सारनाथ बौद्ध मत का तीर्थ है ही। जैन और तिब्बती के लिए भी तीरथ है।
धीरे धीरेसमय बदला हवा से बातें करने वाली गाड़ियां और हवाई बातें करने के लिए मोबाइल आ गए। चौड़ी चिकनी सड़कों ने बनारस के लोगों में एक और शौक़ विकसित कर दिया है । वह है - लांग ड्राइविंग का आनंद लेते हुए ‘लखनिया दरी’जाना
यह साइट बड़ी तेज़ी से पिकनिक स्पॉट के रूप में पसंद की जा रही है ।
दरी यानि जलप्रपात, झरना।
यूँतो ये जगह  मिर्ज़ापुर जनपद में है ।मिर्ज़ापुर से 1989-90 में अलग होकर बने नए जनपद सोनभद्र  में कई झरने हैं-राजदरी , देवदरी, विनढम फाल ।किंतु बनारस मुख्यालय से 70-75 कि० मी० की दूरी पर होने के कारण सबसे नज़दीकी और ख़ूबसूरत झरना लखनिया ही है।
बारिश के मौसम में ये जगह घूमने लायक है। पुरातत्व के विद्यार्थियों के अध्ययन की भी कुछ सामग्री यहाँ मिलेगी। किंतु कुछ दुर्घटनाओं के बाद घूमने जाने वालों को छः बजे के बाद अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं है।
यहाँ छूटपुट दुकानें हैं पकौड़ी चाय बिस्कुट की।आप वहाँ जा के पका के भी खाने का आनंद ले सकते हैं। बारिश में किसी भी जगह से फूट के बहता झरना अलग ही अनुभूति देता है।
गाड़ी में ए॰सी॰ है तो लांग ड्राइव 50 डिग्री की धधकती गरमी में भी हो सकती है।बरसती आग वाली गरमी में ही हम सब चले गए लखनिया।
ख़ास बात लांग ड्राइव वाली सरपीली सड़क अखिलेश यादव के समय की बनवायी हुई है।


दिल हुकहुकहुकहुकहुकहुकहुकहुक दिल
हुक हो गया हूँ तेरे साउंड पे
एफ़॰एम॰बजाते रहो।
इस गाने के साथ साथ लखनिया दरी(जनपद-सोनभद्र) के सर्पीले रास्ते घूमते रहिए। अखिलेश यादव की देन है ये।
दूसरा पड़ाव....
चुनार को आप जानते हैं? नहीं, तो अब जानिए।

लखनिया से वापसी में हमलोगों का जत्था अचानक मुड़ गया चुनार की ओर।ये हुआ कि लगे हाथ चुनार भी देख लिया जाय। चुनार मिर्ज़ापुर जनपद में स्थित एक शहर/तहसील मुख्यालय है और बनारस से लगभग पचास किमी दूर है।

हम सब सबसे पहले वहाँ की चीनी मिट्टी के बर्तन की एक दुकान पर पहुँचे।
सुनते हैं,तकरीबन पैंसठ साल पहले शुरू हुए चुनार के पाटरी उद्योग कारोबार का अतीत स्वर्णिम रहा है। चुनार में स्थापित किले के बाद यदि किसी चीज ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनार को पहचान दिलाई तो वह है चुनार का पाटरी उद्योग और यहां बनने वाले चीनी मिट्टी के खिलौने, जार, मर्तबान, कप प्लेट,मूर्तियां , गमले, विंडचाइम,ब्लूपॉटरी इत्यादि।
कारख़ाना कहीं और था । हम सीधे शाप पर गए । चारपाँच बड़े बड़े हाल जैसे कमरों में जीने की सीढ़ियों से लेकर छत रोशनदान तक पॉटरी ही पॉटरी।हमें एक बार को लगा नामवर जी के घर में इसी तरह किताबें भरी रहती होंगी।
क्या लें क्या छोड़ें की जद्दोजहद के बीच हमने फ़्लावरपॉट, अचारदानी, गुल्लक, ऐशट्रे जैसे छोटे छोटे सामान लिए।दाम बहुत ही वाजिब और बिना मोलभाव के थे।
कभी भी चुनार आयें तो यादगार के तौर पर यहाँ के चीनी मिट्टी के बने सामान लेना न भूलें।हुनरमंद हाथों को पैसा और आपको यात्रा की निशानी मिल जाएगी।

शाम होने को थी। अब बारी थी दूसरी महत्वपूर्णजगह देखने की वो था चुनार का क़िला।
पढ़ते रहे पढ़ाते रहे चुनार के क़िले से जुड़ी दास्तान । शेरशाह और हुमायूँ से जुड़े पाठ में। किंतु हाय रे हमारी शिक्षा व्यवस्था ! पड़ोस में बसे इस क़िले को देखने का मौक़ा इतने सालों बाद इस बार लगा।
किसी भी क़िले में जा के उसकी दरोदीवार से गुज़रते हुए मैं इतिहास में समाने लगती हूँ।लोगों को खंडहर दिख सकता है पर मुझे उसे महसूसना बहुत ही सुकून और जिज्ञासा को बढ़ाने वाला होता है।
यहाँ हमारे गाइड थे 13वर्षीय मनीष। मनीष के पिताजी गेस्टहाउस में कर्मचारी हैं। बहुत ही उत्साही बच्चा। हमने उसे आगे इतिहास विषय पढ़ने की सलाह दी।
चुनार यू॰पी॰ के मिर्ज़ापुर जनपद की एक तहसील है। गंगा नदी के किनारे कैमूर की पहाड़ियों पर बने इस क़िले का इतिहास आप गूगल कर सकते हैं। इस क़िले का इतिहास 56 BC में विक्रमादित्य से लेकर अठारहवीं सदी के अंत में वारेन हेस्टिंग्ज़ और आज़ादी तक आता है। बताते हैं कि हेस्टिंग्ज को यह क़िला बहुत पसंद था।
-देवकीनंदन खत्री के काल्पनिक तिलिस्मि उपन्यास चन्द्रकांता का केंद्रबिंदु यह चुनारगढ़ का क़िला है।
-क़िले के अंदर सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई भर्तृहरि की समाधि और एक मंदिर है ।
-क़िले में कई गहरी और रहस्यमयी सुरंगों के मुहाने दिखते हैं।
- कई बंद तहख़ाने हैं।
- यहाँ एक बहुत ही बड़ा चौड़ा कुआँ है।
- घोड़ों के अस्तबल
अपराधियों को फाँसी देने की जगह।
-ढलान वाली सीढ़ियाँ
- सोनवा रानी का मंडप, झरोखा इत्यादि दर्शनीय हैं।
अब यहाँ पीडबल्यूडी का गेस्ट हाउस है। इसलिए कुछ भाग साफ़ सुथरा और मेंटेन है।
वैसे क़िला जीर्ण शीर्ण सौ बरस तक सोती राजकुमारी की कहानी की तरह झाड़ियों से घिरा हुआ,ख़स्ता हालत में बिना ख़ास देखरेख के सैलानियों की छूटपुट आवाजाही से अपनी वीरानी को तोड़ता रहता है।
सड़क से क़िले का बाहरी दृश्य और क़िले के अंदर से नदी में तैरती नौकाओं और आसपास का दृश्य रोमांचकारी लगता है।
क़िला देखना हमारी यात्रा को यादगार बना गया । अगले सत्र में शेरशाह हुमायूँ पढ़ाते हुए हम अपने विद्यार्थियों को आँखों देखी भी बता सकेंगे।

Comments

  1. Banaras gye Kai bar magar is jagah ka jikra kisi ne nhi Kiya ab pata chala hai to abki bar jb bhi Jana hua to dekh ke ayenge.
    Aap bht badhiya likhti hai Mami ji

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  2. मै यहां घर बैठे किले की खूबसूरती का अंदाजा आपके शब्दो से लगा सकता हूं ,
    और अब मेरे मन में भी किला देखने की उत्सुकता हो रही है।

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    1. बिलकुल अभी अभी प्रियंका गांधी वहीं रोकी गई थीं

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  3. Nice information.Beauty becomes more beautiful with addition of truth.

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  4. इतना सजीव चित्रण तुम्हारे अलावा कोई नहीं कर सकता। तुम्हारी आंखो से हमने भी देख लिया।

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  5. बहुत सुंदर यात्रा वृतान्त

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