जियुतिया(जीवित पुत्रिक़ा) व्रत के बहाने थालपोस कथा


पूरब के क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले कठिन व्रतों में से एक ये व्रत भी है। क़रीब 30 घंटे का निर्जला व्रत।
पता नहीं कौन रीत चला गया।धीरे धीरे ये कर्मकांड और भी बढ़ रहा बल्कि गाजे बाजे के साथ हो रहा है। बैंड बाजा के साथ त्योहार मनाना तो अच्छी बात है। पर कठिन व्रत रखना , मेरी समझ के बाहर। और हमने अपने रखे जाने वाले व्रतों के लिए अपनी समझाईश पुख़्ता कर ली है। कोई भी व्रत फलाहर ही रखते हैं।
ससुराल में हमारी सासु माँ कहती रह गईं पर किसी बहू ने हिम्मत नहीं किया इस व्रत को शुरू करने की।
अब बीमार पड़ जाएँ चाहे लस्त पस्त हो जाएँ पर जिसने व्रत करना शुरू कर दिया तो पुत्रों की चिरायु की कामना के लिए ये व्रत छोड़ती नहीं। इस डर से कि कोई अनहोनी न हो जाय।परम्पराओं को तोड़ना छोड़ना आसान नहीं। गाँव हो शहर। इनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं
बनारस में आलम ये है कि घरों में काम करने वाली सभी सहायिकाएँ इस व्रत के लिए 2से 3 दिन की छुट्टी लेती हैं। बेटा चाहे दारूबाज़ हो या और भी ग़लत आदतों को पाले हो पर इन्हें समझाना मुश्किल है कि व्रत नहीं (सपरता) होता तो ना रखो।
कहेंगी “जियूतिया माई जब तक हिम्मत दीहयं तबले भुक्खल जाई।”
बहरहाल हम दूसरी बात कह रहे थे।
हमारे मायके के गाँव में आज की पूजा के चित्र देख कर हमारा दिल इन थालपोस में अटक गया और उलझा ही नहीं यादों की गलियों में भी ले गया।


जब लड़कियाँ पढ़ती कम थीं गुनती जियादा थीं, तब बुनती थीं थालपोस। और वो थालपोस जो बिटिया के हुनर का नमूना था माँ संभाल-बचा के रख देतीं झाँपी में सजाने के लिए।
बात मो आगे बढाया पायल राय ने -"थालपोश अब ओही घर में बनावल जाला जहां आधुनिकता आपन रंग न जमवले ह औरी झॉंपी सजावे का चलन उहो समाप्त हो चलल बा|हमनी के याद बा जब घर में केहु क बियाह होत रहे त चार दिन पहिले टोला में क आजी, बड़की माई, चाची फुआ बड़की दिदिया सब केहु झॉपी देखे ख़ातिर आवत रहल ह औरी झॉपी साजे के कुछ न कुछ देतो रहल ह |अब त नया जमाना आ गइल बा सब आपन पसंद क सामान कीन के पहिरत बा अब त लागत बा थालपोश त न बनी मोबाइल कवर बनावे ख़ातिर प्रोत्साहित करे के पड़ी|
सर्दी में ऊन से और गरमी के दिनों में सूती धागों व क्रोशिए की धुन के बीच प्यारे से फूल और नमूने उतर आते थे ,थालपोस पर।
चढ़ावे के लिए फलों और मेवे पर ढके थालपोस को कोई सराह देता तो मन खिल जाता। बेटियाँ छोटी छोटी बातों में ही ख़ुशियाँ खोज लेती थीं।
सब सीख रहे थे तो हमने भी सीखा छठीं कक्षा में क्रोशिया चलाना, बलरामपुर में ।मुस्लिम बहुल मुहल्ले के घरों का अड़ोस पड़ोस होने से क्रोशिया चलाने का हुनर आया। फिर क्या था रुमाल मेजपोश, पेटिकोट, कुर्ते, चादर सभी की लेस क्रोशिए से बना डाली गई। कभी पूरा मेजपोश भी क्रोशिए से बना। कभी डुपट्टे की लेस और बीच बीच में बूटे भी बने।
वैसे क्रोशिया से कुछ भी बनाने से अधिक उघाड़ने में मज़ा आता था। ग़लती हुई नहीं कि ऊन या धागे का गोला वापस अपने रूप में आ जाता।
बाद में थालपोस टेबल के सेंटर पीस के रूप में सजाने के काम आयी। अब तो फ़ैशन आए या जाए कुछ भी बनाने का समय ही नहीं मिलता।
(ग़ालिब साहब से माफ़ी के साथ)
“किताबों ने ज़ालिम निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे हुनर के”
23/09/2019

Comments

  1. Ma'am क्रोशिया एवं जियुतिया व्रत से अवगत कराने के लिए आपका बहुत धन्यवाद ।ग्रामीण क्षेत्र एवं इस व्रत प्रथा का शब्दचित्र अत्यंत सुन्दर एवं आकर्षक प्रतीत होता है । आपके लेख अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं अंतः स्पर्शी होते हैं😊😊।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

NEP 2020 और महाविद्यालय परिसर

लखनिया दरी और चुनार के यात्रा संस्मरण

आइस पाइस